The Office of the Governor in the Indian Polity: Constitutional Mandate, Powers, and Federal Structure | भारतीय राज्यव्यवस्था में राज्यपाल का पद: संवैधानिक अधिदेश, शक्तियाँ, और संघीय ढांचे

भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में राज्यपाल (Governor) का पद केंद्र और राज्यों के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील कड़ी के रूप में स्थापित है। संविधान के भाग 6 के अंतर्गत अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्य कार्यपालिका के ढांचे का विवरण दिया गया है, जिसमें राज्यपाल को राज्य के संवैधानिक प्रमुख (Constitutional Head) की भूमिका सौंपी गई है । ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारतीय संविधान निर्माताओं ने कनाडा की संघीय प्रणाली से प्रेरणा लेते हुए राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र द्वारा किए जाने का प्रावधान किया, ताकि राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित किया जा सके । हालांकि, समय के साथ इस पद की भूमिका केवल एक संवैधानिक औपचारिकता तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह केंद्र और राज्य सरकारों के बीच राजनीतिक खींचतान और संवैधानिक विवादों का केंद्र बन गई है । राज्यपाल की शक्तियों, विशेषकर उनके विवेकाधीन अधिकारों और केंद्र के ‘एजेंट’ के रूप में उनकी कथित भूमिका ने निरंतर भारतीय लोकतंत्र की संघीय मर्यादाओं पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं ।

Table of Contents

राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति और नियुक्ति का ढांचा (Constitutional position of the Governor and the framework for his appointment)

संविधान का अनुच्छेद 153 स्पष्ट रूप से यह अधिदेश देता है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा। हालांकि, 7वें संविधान संशोधन अधिनियम (1956) के माध्यम से एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों के लिए राज्यपाल नियुक्त करने का मार्ग प्रशस्त किया गया, जो प्रशासनिक लचीलेपन को दर्शाता है । राज्यपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया लोकतांत्रिक निर्वाचन के बजाय केंद्र द्वारा नामांकन पर आधारित है। अनुच्छेद 155 के अनुसार, भारत का राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र (Warrant) द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति करता है । यह प्रणाली इस विचार पर आधारित थी कि एक निर्वाचित राज्यपाल और एक निर्वाचित मुख्यमंत्री के बीच सत्ता का संघर्ष हो सकता है, जिससे राज्य प्रशासन पंगु हो सकता है ।   

राज्यपाल पद के लिए पात्रता की शर्तें अत्यंत सरल लेकिन महत्वपूर्ण हैं। अनुच्छेद 157 के तहत, संबंधित व्यक्ति को भारत का नागरिक होना चाहिए और उसकी आयु कम से कम 35 वर्ष पूर्ण होनी चाहिए । इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 158 के अंतर्गत कुछ सेवा शर्तें निर्धारित की गई हैं, जैसे कि वह संसद या राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं होना चाहिए और न ही किसी लाभ के पद पर आसीन होना चाहिए ।  

भारतीय संविधान में राज्यपाल से संबंधित प्रमुख अनुच्छेद नीचे तालिका (Table) के रूप में दिए गए हैं:

अनुच्छेद संख्याविषयसंक्षिप्त विवरण
153राज्यों में राज्यपालप्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल होगा।
154कार्यपालिका शक्तिराज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी।
155नियुक्तिराज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
156कार्यकालराज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर रहता है (आमतौर पर 5 वर्ष)।
157योग्यताराज्यपाल बनने के लिए भारतीय नागरिक होना और 35 वर्ष की आयु पूर्ण होना आवश्यक है।
158पद की शर्तेंअन्य लाभ का पद धारण नहीं करेगा तथा वेतन-भत्ते निर्धारित हैं।
159शपथपद ग्रहण से पूर्व शपथ या प्रतिज्ञा लेता है।
160आकस्मिक प्रावधानविशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति राज्यपाल के कार्यों की व्यवस्था कर सकता है।
161क्षमादान शक्तिराज्यपाल को दया, क्षमा, दंड स्थगन आदि की शक्ति प्राप्त है।
162कार्यपालिका की सीमाराज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार।
163मंत्रिपरिषद की सहायताराज्यपाल, मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करेगा (कुछ विवेकाधीन शक्तियाँ)।
164मंत्रियों की नियुक्तिमुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर।
165महाधिवक्ताराज्य का महाधिवक्ता राज्यपाल द्वारा नियुक्त किया जाता है।
166कार्य संचालनराज्य सरकार के कार्य राज्यपाल के नाम से किए जाते हैं।
167मुख्यमंत्री के कर्तव्यमुख्यमंत्री का कर्तव्य है कि वह राज्यपाल को जानकारी दे।
174विधानसभा सत्रराज्यपाल विधानसभा को बुला, स्थगित या भंग कर सकता है।
175सदन को संबोधनराज्यपाल सदन को संबोधित कर सकता है।
176विशेष अभिभाषणप्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र में राज्यपाल का अभिभाषण।
200विधेयकों पर स्वीकृतिराज्यपाल विधेयक को स्वीकृति, अस्वीकृति या राष्ट्रपति के विचार हेतु सुरक्षित रख सकता है।
201राष्ट्रपति के विचारार्थ विधेयकराष्ट्रपति के निर्णय तक लंबित रखा जा सकता है।
213अध्यादेश शक्तिविधानसभा सत्र में न होने पर अध्यादेश जारी कर सकता है।

राज्यपाल की पदावधि को लेकर ‘प्रसादपर्यन्त’ (Doctrine of Pleasure) का सिद्धांत अत्यधिक चर्चा का विषय रहा है। अनुच्छेद 156(1) के तहत, राज्यपाल का कार्यकाल राष्ट्रपति की इच्छा पर निर्भर करता है, जिसका अर्थ है कि केंद्र सरकार किसी भी समय बिना कारण बताए राज्यपाल को पद से हटा सकती है । हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि यह शक्ति मनमानी नहीं होनी चाहिए, फिर भी व्यवहार में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के साथ ही राज्यों के राज्यपालों को बदलने की परंपरा निरंतर बनी हुई है

राज्य प्रशासन में राज्यपाल की बहुआयामी शक्तियाँ: संवैधानिक पद या शक्ति का केंद्र? (Multifaceted Powers of the Governor in State Administration: Constitutional Post or Centre of Power?)

भारतीय संघीय व्यवस्था में राज्यपाल का पद अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुआयामी है। राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है, परंतु उसकी भूमिका केवल औपचारिक नहीं है। भारतीय संविधान के विभिन्न प्रावधान राज्यपाल को कार्यपालिका, विधायिका, वित्त और न्यायपालिका के क्षेत्रों में व्यापक अधिकार प्रदान करते हैं। विशेष परिस्थितियों में उसकी विवेकाधीन शक्तियाँ उसे राज्य राजनीति का केंद्रीय पात्र भी बना देती हैं।

यह लेख राज्यपाल की शक्तियों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।


1️⃣ कार्यपालिका शक्तियाँ: प्रशासन का संवैधानिक आधार (Executive Powers: Constitutional Basis of Administration)

संविधान के अनुच्छेद 154(1) के अनुसार राज्य की समस्त कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है। यद्यपि इन शक्तियों का वास्तविक प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर होता है, फिर भी प्रशासनिक ढांचे की संवैधानिक वैधता राज्यपाल से ही जुड़ी होती है।

मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की नियुक्ति (Appointment of Chief Minister and Council of Ministers)

अनुच्छेद 164 के अंतर्गत राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है। सामान्य परिस्थितियों में वह विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है। किंतु यदि किसी चुनाव में स्पष्ट बहुमत न हो (हंग विधानसभा), तो राज्यपाल का विवेक निर्णायक हो जाता है।

मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति भी राज्यपाल करता है। मंत्री “राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त” पद पर रहते हैं, जिसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि जब तक मंत्रिपरिषद को विधानसभा का विश्वास प्राप्त है, वह पद पर बनी रहती है।

महाधिवक्ता और प्रशासनिक संरचना (Advocate General and Administrative Structure)

अनुच्छेद 165 के अनुसार राज्यपाल राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति करता है, जो राज्य सरकार का सर्वोच्च विधिक सलाहकार होता है।

अनुच्छेद 166 यह सुनिश्चित करता है कि राज्य सरकार के सभी कार्य “राज्यपाल के नाम से” संपादित हों। इससे प्रशासनिक कार्यवाही को संवैधानिक आधार प्राप्त होता है।

मुख्यमंत्री से सूचना प्राप्त करने का अधिकार (Right to receive information from the Chief Minister)

अनुच्छेद 167 मुख्यमंत्री को यह बाध्य करता है कि वह राज्यपाल को राज्य प्रशासन से संबंधित सभी महत्वपूर्ण निर्णयों की जानकारी दे। यह प्रावधान राज्यपाल को प्रशासनिक निगरानी की भूमिका प्रदान करता है तथा आवश्यकता पड़ने पर केंद्र को रिपोर्ट भेजने का आधार बनता है।

विश्वविद्यालयों में भूमिका

अधिकांश राज्यों में राज्यपाल राज्य विश्वविद्यालयों के पदेन कुलाधिपति (Chancellor) होते हैं। वे कुलपतियों की नियुक्ति करते हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन की निगरानी करते हैं। हाल के वर्षों में यह क्षेत्र राज्य सरकारों और राजभवन के बीच टकराव का विषय भी बना है।


2️⃣ विधायी शक्तियाँ और वीटो अधिकार (Legislative powers and veto power)

राज्यपाल राज्य की विधायिका का अभिन्न अंग है।

सत्र बुलाने और भंग करने की शक्ति

अनुच्छेद 174 के अनुसार राज्यपाल विधानसभा का सत्र बुला सकता है, स्थगित कर सकता है और विधानसभा को भंग कर सकता है।

अनुच्छेद 175 और 176 राज्यपाल को सदन को संबोधित करने तथा वर्ष के प्रथम सत्र में विशेष अभिभाषण देने का अधिकार देते हैं।

विधेयकों पर स्वीकृति और वीटो

जब कोई विधेयक विधानसभा से पारित होकर राज्यपाल के पास आता है, तो उसके पास चार विकल्प होते हैं—

  1. स्वीकृति देना
  2. स्वीकृति रोकना (पूर्ण वीटो)
  3. पुनर्विचार हेतु वापस भेजना (निलंबनकारी वीटो)
  4. राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखना

यह शक्ति विशेष रूप से महत्वपूर्ण तब हो जाती है जब राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेज देता है। इस स्थिति में अंतिम निर्णय केंद्र स्तर पर होता है।

अध्यादेश शक्ति

अनुच्छेद 213 के अनुसार जब विधानसभा सत्र में न हो और तत्काल कानून बनाने की आवश्यकता हो, तो राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकता है। यह अस्थायी कानून होता है जिसे बाद में सदन से स्वीकृति लेनी होती है।


3️⃣ वित्तीय शक्तियाँ: राज्य की आर्थिक संरचना में भूमिका (Financial Powers: Role in the Economic Structure of the State)

राज्यपाल की अनुशंसा के बिना कोई भी धन विधेयक (Money Bill) विधानसभा में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। राज्य का वार्षिक बजट भी उसकी अनुशंसा पर ही प्रस्तुत होता है।

राज्य की आकस्मिक निधि (Contingency Fund) राज्यपाल के नियंत्रण में होती है, जिससे आपातकालीन व्यय की अनुमति दी जाती है।

इसके अतिरिक्त, वह राज्य वित्त आयोग की नियुक्ति भी करता है, जो स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है।


4️⃣ न्यायिक शक्तियाँ: दया और क्षमादान (Judicial powers: mercy and clemency)

अनुच्छेद 161 के अंतर्गत राज्यपाल को क्षमादान, दंड में कमी, दंड स्थगन या दंड रूपांतरण की शक्ति प्राप्त है। यह शक्ति राज्य कानूनों के अंतर्गत दिए गए दंडों पर लागू होती है।

वह उच्च न्यायालय से परामर्श कर जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति भी करता है।


5️⃣ विवेकाधीन शक्तियाँ: संवैधानिक अस्पष्टता का क्षेत्र (Discretionary Powers: An Area of ​​Constitutional Ambiguity)

अनुच्छेद 163 के अनुसार कुछ मामलों में राज्यपाल अपने विवेक से कार्य कर सकता है। संविधान ने इन मामलों की स्पष्ट सूची नहीं दी है, जिससे व्याख्या और विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है।

मुख्यमंत्री की नियुक्ति (जब स्पष्ट बहुमत न हो), राष्ट्रपति शासन की सिफारिश, विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजना — ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ राज्यपाल की भूमिका अत्यंत प्रभावशाली हो जाती है।

जब राज्य और केंद्र में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें होती हैं, तब यह पद अक्सर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ जाता है। इसी कारण राज्यपाल को कभी-कभी “संवैधानिक प्रमुख” तो कभी “शक्ति का केंद्र” कहा जाता है।

राज्यपाल के पद से जुड़े समकालीन विवाद और राजनीतिक टकराव

राज्यपाल का पद अपनी प्रकृति में एक ‘संवैधानिक मध्यस्थ’ का होना चाहिए था, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह ‘केंद्र के एजेंट’ के आरोपों से घिरा हुआ है । विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच बढ़ता टकराव भारतीय संघवाद के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है।   

केंद्र-राज्य संघर्ष के प्रमुख बिंदु

हाल के वर्षों में विवादों की एक लंबी सूची तैयार हुई है, जिसमें राज्यपालों की भूमिका पर तीखे सवाल उठाए गए हैं:

  • विधेयकों को रोकना (Pocket Veto): तमिलनाडु, केरल और पंजाब जैसे राज्यों में राज्यपालों ने विधानसभा द्वारा पारित महत्वपूर्ण विधेयकों को कई वर्षों तक बिना किसी निर्णय के लंबित रखा है । चूंकि संविधान निर्णय लेने के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं करता, इसलिए राज्यपाल इस अस्पष्टता का उपयोग विधायी प्रक्रिया को बाधित करने के लिए करते हैं 。   
  • सत्र बुलाने में देरी: कई मामलों में राज्यपालों ने बहुमत परीक्षण के लिए या नियमित विधायी कार्यों के लिए मुख्यमंत्री के परामर्श के बावजूद सत्र बुलाने से इनकार किया है या उसमें विलंब किया है ।   
  • विश्वविद्यालय प्रशासन में हस्तक्षेप: केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर राज्यपाल और सरकार के बीच सीधा युद्ध देखा गया है । राज्य सरकारों का आरोप है कि राज्यपाल राजभवन का राजनीतिकरण कर रहे हैं और उच्च शिक्षा में केंद्र के एजेंडे को थोप रहे हैं ।   
  • अभिभाषण में काट-छाँट: कुछ राज्यपालों ने सरकार द्वारा तैयार किए गए आधिकारिक अभिभाषण के कुछ अंशों को पढ़ने से इनकार कर दिया है या अपनी ओर से टिप्पणियां जोड़ी हैं, जो संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन माना गया है । 

2024-2025 के नवीनतम घटनाक्रम

वर्ष 2024 और 2025 के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप ने राज्यपाल की शक्तियों की नई व्याख्या की है। तमिलनाडु बनाम राज्यपाल (2025) के ऐतिहासिक मामले में, न्यायालय ने राज्यपाल आर.एन. रवि द्वारा 10 विधेयकों को राष्ट्रपति के पास भेजने के निर्णय को ‘अवैध’ घोषित किया । न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि विधानसभा किसी विधेयक को पुनर्विचार के बाद दोबारा पारित करती है, तो राज्यपाल के पास उसे राष्ट्रपति के पास भेजने का कोई विकल्प नहीं बचता; उसे अनिवार्य रूप से सहमति देनी होगी । इसी प्रकार, केरल के संदर्भ में न्यायालय ने राज्यपालों की ‘निष्क्रियता’ पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि वे चुनी हुई सरकारों के विधायी कार्यों को अनिश्चित काल तक पंगु नहीं बना सकते

राज्यविवाद का मुख्य कारण (2023-2025)न्यायिक/राजनीतिक परिणाम
तमिलनाडु10 विधेयकों को राष्ट्रपति हेतु आरक्षित करना SC ने इसे अवैध ठहराया और अनिवार्य सहमति का आदेश दिया
केरलकुलपतियों की नियुक्ति और विधेयकों में देरी SC द्वारा राज्यपाल की शक्तियों पर स्पष्टीकरण और देरी पर चिंता
पंजाबविधानसभा सत्र की वैधता को चुनौती देना SC ने सत्र को वैध माना और राज्यपाल को विधेयक न रोकने का निर्देश दिया
पश्चिम बंगालविश्वविद्यालय अनुदान और प्रशासनिक नियुक्तियाँ राजभवन और सचिवालय के बीच निरंतर गतिरोध

न्यायिक हस्तक्षेप: संवैधानिक मर्यादाओं की पुनर्स्थापना

भारतीय न्यायपालिका ने राज्यपाल के पद के दुरुपयोग को रोकने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से न्यायालय ने राज्यपाल की शक्तियों को संवैधानिक सीमाओं के भीतर बांधने का प्रयास किया है।

  1. एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): इस निर्णय ने अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर अंकुश लगाया। न्यायालय ने व्यवस्था दी कि बहुमत का फैसला राजभवन की सड़कों पर नहीं बल्कि विधानसभा के पटल पर होना चाहिए । इसके बाद से राष्ट्रपति शासन लगाने की दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है।   
  2. नबाम रेबिया बनाम उपाध्यक्ष (2016): सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल केवल उन परिस्थितियों में विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग कर सकता है जो संविधान द्वारा विशेष रूप से अनुमत हैं । न्यायालय ने यह भी कहा कि राज्यपाल ‘मनमाने ढंग’ से कार्य नहीं कर सकता और उसके पास अपनी कार्रवाइयों के लिए तार्किक आधार होना चाहिए ।   
  3. रमेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006): बिहार विधानसभा के विघटन के मामले में, न्यायालय ने राज्यपाल की भूमिका की कड़ी आलोचना की और कहा कि राज्यपाल का व्यक्तिपरक मूल्यांकन दुर्भावनापूर्ण नहीं होना चाहिए और यह न्यायिक समीक्षा के अधीन है ।   
  4. बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ (2010): न्यायालय ने फैसला सुनाया कि हालांकि राष्ट्रपति को राज्यपाल को हटाने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार मनमाना या अनुचित नहीं हो सकता। राज्यपाल को केवल इसलिए नहीं हटाया जा सकता क्योंकि उसकी विचारधारा केंद्र की विचारधारा से मेल नहीं खाती ।

सुधार हेतु आयोगों की सिफारिशें और भविष्य की राह

राज्यपाल के पद को लेकर बढ़ते विवादों को देखते हुए समय-समय पर विभिन्न आयोगों ने इसके पुनर्गठन और कार्यप्रणाली में सुधार के सुझाव दिए हैं। इन सिफारिशों का मुख्य उद्देश्य राज्यपाल को एक निष्पक्ष संवैधानिक प्रमुख के रूप में पुनर्स्थापित करना है।

सरकारिया आयोग (1988) की मुख्य सिफारिशें

न्यायमूर्ति आर.एस. सरकारिया के नेतृत्व में गठित आयोग ने केंद्र-राज्य संबंधों को संतुलित करने के लिए महत्वपूर्ण प्रस्ताव दिए थे :   

  • नियुक्ति प्रक्रिया: राज्यपाल के रूप में नियुक्त व्यक्ति को संबंधित राज्य के बाहर का होना चाहिए और वह सक्रिय राजनीति (विशेषकर हाल के वर्षों में) में शामिल नहीं होना चाहिए ।   
  • मुख्यमंत्री से परामर्श: राज्यपाल की नियुक्ति से पहले मुख्यमंत्री के साथ परामर्श की एक अनिवार्य प्रक्रिया होनी चाहिए ।   
  • अनुच्छेद 356: इसका उपयोग केवल ‘अंतिम विकल्प’ के रूप में तब किया जाना चाहिए जब संवैधानिक तंत्र की विफलता के सभी वैकल्पिक सुधार विफल हो चुके हों ।   
  • कार्यकाल की सुरक्षा: राज्यपाल को उसका 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा करने देना चाहिए। उसे केवल दुर्लभ और गंभीर आधारों पर ही हटाया जाना चाहिए । 

पुंछी आयोग (2010) की अग्रगामी सिफारिशें

मदन मोहन पुंछी आयोग ने सरकारिया आयोग की सिफारिशों को और आगे बढ़ाते हुए कुछ क्रांतिकारी सुझाव दिए :

  • महाभियोग का प्रावधान: राज्यपाल को हटाने की प्रक्रिया राष्ट्रपति के समान ही होनी चाहिए, जिसमें राज्य विधानसभा द्वारा महाभियोग का प्रस्ताव पारित करना शामिल हो । इससे ‘प्रसादपर्यन्त’ सिद्धांत की मनमानी समाप्त होगी।
  • विधेयकों पर समय सीमा: राज्यपाल को किसी विधेयक पर स्वीकृति देने या उसे राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करने का निर्णय अधिकतम 6 महीने के भीतर लेना चाहिए ।
  • विश्वविद्यालयों में भूमिका का अंत: राज्यपालों को विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में कार्य करने की परंपरा को समाप्त किया जाना चाहिए, ताकि वे अनावश्यक विवादों से बच सकें ।
  • त्रिशंकु विधानसभा हेतु दिशा-निर्देश: आयोग ने मुख्यमंत्री की नियुक्ति के लिए एक स्पष्ट वरीयता क्रम निर्धारित करने का सुझाव दिया, ताकि राज्यपाल का विवेकाधिकार पक्षपातपूर्ण न हो ।

द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) के सुझाव

वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में गठित द्वितीय एआरसी ने प्रशासनिक नैतिकता पर बल दिया :

  • गैर-पक्षपातपूर्ण व्यक्तित्व: केवल उन्हीं व्यक्तियों को राज्यपाल बनाया जाना चाहिए जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक निष्पक्षता बनाए रखी हो 。
  • दलबदल पर नियंत्रण: दलबदल के आधार पर अयोग्यता का निर्णय लेने में राज्यपाल को चुनाव आयोग की सलाह के अनुसार कार्य करना चाहिए ।
  • नैतिक शासन: राज्यपालों को राज्य सरकार के साथ सहयोग के लिए एक ‘आचार संहिता’ (Code of Conduct) का पालन करना चाहिए 。
आयोग का नामप्रमुख बलक्रांतिकारी सुझाव
सरकारिया (1988)नियुक्ति की निष्पक्षतामुख्यमंत्री से परामर्श, राज्य के बाहर का व्यक्ति
पुंछी (2010)कार्यकाल की सुरक्षाविधानसभा द्वारा महाभियोग, 6 महीने की समय सीमा
द्वितीय ARC (2005)प्रशासनिक नैतिकतादलबदल पर नियंत्रण, अनुभवी प्रशासकों का चयन

राज्यपाल: केंद्र और राज्य के बीच एक प्रभावी ‘सेतु’

संविधान के तहत राज्यपाल की परिकल्पना केवल एक अलंकारी पद के रूप में नहीं, बल्कि संघीय ढांचे को मजबूती प्रदान करने वाले एक ‘पुल’ (Link) के रूप में की गई थी । वह केंद्र सरकार की नीतियों को राज्य में समन्वयित करने और राज्य की चुनौतियों को केंद्र तक पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है ।   

प्रभावी समन्वय की भूमिका में राज्यपाल के कार्य:

  • संकट प्रबंधन: प्राकृतिक आपदाओं, महामारियों या सुरक्षा संकटों के समय राज्यपाल केंद्र से सहायता (जैसे NDRF या सशस्त्र बल) प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।   
  • संवैधानिक प्रहरी: वह यह सुनिश्चित करता है कि राज्य का शासन संविधान की मर्यादाओं के भीतर चले । यदि राज्य सरकार संविधान का उल्लंघन करती है, तो वह परामर्शदाता और सचेतक की भूमिका निभाता है।   
  • सूचना का माध्यम: राज्यपाल के नियतकालिक प्रतिवेदन (Fortnightly Reports) राष्ट्रपति को राज्य की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं से अवगत कराते हैं 。   

भविष्य में राज्यपाल के पद की प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितना ‘अराजनीतिक’ बनाया जा सकता है। राज्यपाल को किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा के प्रतिनिधि के बजाय ‘संविधान के प्रतिनिधि’ के रूप में कार्य करना चाहिए। जब तक नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं आती और विवेकाधीन शक्तियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया जाता, तब तक राजभवन और निर्वाचित सरकारों के बीच घर्षण बना रहेगा । लोकतांत्रिक परिपक्वता की मांग है कि राज्यपाल का पद संघवाद के रक्षक के रूप में अपनी खोई हुई गरिमा को पुनः प्राप्त करे और राष्ट्र की एकता के साथ-साथ राज्यों की स्वायत्तता का भी सम्मान करे ।   

इस प्रकार, राज्यपाल भारतीय राज्यव्यवस्था का एक ऐसा अनिवार्य स्तंभ है जिसकी उपयोगिता उसके द्वारा प्रयोग की जाने वाली ‘शक्ति’ में नहीं, बल्कि उसके द्वारा प्रदर्शित ‘संवैधानिक विवेक’ और ‘निष्पक्षता’ में निहित है। यदि सुधार आयोगों की सिफारिशों को ईमानदारी से लागू किया जाता है, तो यह पद वास्तव में भारतीय लोकतंत्र की संघीय भावना को सुदृढ़ करने वाला सबसे महत्वपूर्ण तंत्र बन सकता है।

“ब्रिटिश राज की प्रशासनिक व्यवस्था को विस्तार से समझने के लिए इस संबंधित पोस्ट को भी अवश्य पढ़ें।”

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