महाराणा प्रताप की मृत्यु के बाद मेवाड़ का इतिहास एक नया मोड़ लेता है। जहाँ एक तरफ प्रताप ने कभी सिर नहीं झुकाया, वहीं उनके पुत्र अमर सिंह (Amar Singh I) के समय एक ऐसी ऐतिहासिक घटना हुई जिसने 100 सालों से चले आ रहे युद्ध को रोक दिया।
1615 की मेवाड़-मुगल संधि का सच, उदयपुर के खूबसूरत महलों का निर्माण, और फिर उस शेर की कहानी जिसने औरंगज़ेब को खुली चुनौती दी—महाराणा राज सिंह।
1. महाराणा अमर सिंह और मेवाड़-मुगल संधि (The Treaty of 1615 AD)
प्रताप के बाद अमर सिंह (1597-1620) गद्दी पर बैठे। मुगलों की तरफ से जहाँगीर (Jahangir) ने मेवाड़ को हराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया।
- संधि के हालात: 1613 में जहाँगीर ने अपने बेटे खुर्रम (शाहजहाँ) को विशाल सेना के साथ भेजा। मुगलों ने मेवाड़ के खेतों को जला दिया और रसद (Food supply) रोक दी।
- सामंतों का दबाव: मेवाड़ की जनता और सरदार लगातार युद्ध से थक चुके थे। उन्होंने कुंवर कर्ण सिंह (Karan Singh) के माध्यम से अमर सिंह पर संधि का दबाव डाला।
- संधि (5 Feb 1615): गोगुन्दा में अमर सिंह और खुर्रम के बीच ऐतिहासिक संधि हुई।
संधि की प्रमुख शर्तें :
- महाराणा स्वयं मुगल दरबार में उपस्थित नहीं होंगे (उनके स्थान पर कुंवर कर्ण सिंह जाएंगे)।
- मेवाड़ और मुगलों के बीच कोई वैवाहिक संबंध (Matrimonial Alliance) नहीं होगा।
- चित्तौड़गढ़ का किला मेवाड़ को वापस मिलेगा, लेकिन उसकी मरम्मत (Repair) नहीं करवाई जाएगी (ताकि वह भविष्य में फिर से मजबूत सैन्य अड्डा न बने)।
Note: अमर सिंह इस संधि से इतने दुखी थे कि उन्होंने राजकाज त्याग दिया और जीवन के अंतिम दिन ‘नौचौकी’ (राजसमंद) में बिताए। उनकी छतरी आहड़ (Ahar) में बनी है (यहीं से ‘महासतियां’ शमशान की शुरुआत हुई)।
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2. निर्माण का काल: कर्ण सिंह और जगत सिंह-I (Karan Singh and Jagat Singh-I)
युद्ध रुकने के बाद मेवाड़ में शांति आई और कला-संस्कृति का विकास हुआ।
- कर्ण सिंह (1620-1628):
- इन्होंने उदयपुर में ‘जग मंदिर’ (Jag Mandir) महलों का निर्माण शुरू करवाया।
- इन्हीं महलों में शाहजहाँ (खुर्रम) ने अपने पिता से विद्रोह के दौरान शरण ली थी। कहा जाता है कि ताजमहल बनाने की प्रेरणा शाहजहाँ को यहीं से मिली थी।
- जगत सिंह-I (1628-1652):
- इन्होंने जग मंदिर का काम पूरा करवाया।
- जगदीश मंदिर (Jagdish Temple): उदयपुर में भगवान विष्णु का विशाल पंचायतन शैली का मंदिर बनवाया। इसे ‘सपनों का बना मंदिर’ भी कहते हैं।
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3. महाराणा राज सिंह: औरंगज़ेब का कट्टर दुश्मन (Reign of Raj Singh – 1652-1680)
जगत सिंह के बाद महाराणा राज सिंह गद्दी पर बैठे। यह वो दौर था जब दिल्ली पर क्रूर बादशाह औरंगज़ेब का शासन था। राज सिंह ने संधि की परवाह न करते हुए औरंगज़ेब को सीधी टक्कर दी।
A. जजिया कर का विरोध (Opposition to Jizya Tax)
1679 में जब औरंगज़ेब ने हिंदुओं पर धार्मिक कर ‘जजिया’ (Jizya) फिर से लगाया, तो पूरे भारत में सिर्फ राज सिंह ने एक तीखा पत्र लिखकर इसका विरोध किया।
B. चारुमती विवाह (Charumati Marriage)
किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमती से औरंगज़ेब शादी करना चाहता था। चारुमती ने राज सिंह को पत्र लिखा— “क्या हंसनी अब बगुले के साथ रहेगी?” राज सिंह ने औरंगज़ेब की सेना को रोका और चारुमती से विवाह किया। यह मुगलों को सीधी चुनौती थी।
C. मूर्ति रक्षा (Saving Shrinathji)
औरंगज़ेब जब मंदिरों को तोड़ रहा था, तब वृंदावन से गुसाईं जी श्रीनाथ जी की मूर्ति लेकर आए। जब किसी ने शरण नहीं दी, तो राज सिंह ने कहा— “मेरे सिर के कटने के बाद ही कोई इस मूर्ति को हाथ लगा पाएगा।”
- उन्होंने सिहाड़ (वर्तमान नाथद्वारा) में श्रीनाथ जी का मंदिर बनवाया।
- कांकरोली में द्वारकाधीश का मंदिर बनवाया।
D. चित्तौड़ की मरम्मत
संधि की शर्त तोड़ते हुए राज सिंह ने चित्तौड़ किले की मरम्मत शुरू करवा दी।
4. हाड़ी रानी का बलिदान (The Sacrifice of Hadi Rani)
राज सिंह के समय की ही एक घटना है जो रोंगटे खड़े कर देती है। राज सिंह ने अपने सामंत रतन सिंह चूंडावत (सलूंबर) को औरंगज़ेब की सेना को रोकने का आदेश दिया। रतन सिंह की नई-नई शादी हुई थी। युद्ध में जाते समय उन्होंने अपनी पत्नी हाड़ी रानी (सहज कंवर) से कोई निशानी (Souvenir) मांगी।
हाड़ी रानी को लगा कि पति का मोह युद्ध में बाधक बनेगा।
- बलिदान: रानी ने अपना सिर काट दिया और थाली में सजाकर निशानी के तौर पर भेज दिया।
- रतन सिंह उस सिर को गले में लटकाकर मुगलों पर टूट पड़े और वीरगति को प्राप्त हुए।
चुण्डावत मांगी सेनाणी, सिर काट दे दियो क्षत्राणी।
5. राजसमंद झील का निर्माण (Rajsamand Lake)
राज सिंह न केवल योद्धा थे, बल्कि एक महान निर्माता भी थे।
- अकाल (Famine) राहत कार्यों के तहत उन्होंने गोमती नदी का पानी रोककर राजसमंद झील बनवाई।
- राज प्रशस्ति (Raj Prashasti): इस झील की पाल पर 25 काले संगमरमर के पत्थरों पर दुनिया का सबसे बड़ा शिलालेख (Sanskrit Inscription) लिखवाया गया है, जिसमें बप्पा रावल से राज सिंह तक का इतिहास है। (लेखक: रणछोड़ भट्ट तैलंग)।
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Quick Exam Fact Box
| तथ्य (Fact) | विवरण (Detail) |
| मेवाड़-मुगल संधि | 5 फरवरी 1615 (अमर सिंह – खुर्रम) |
| जगदीश मंदिर | निर्माता: जगत सिंह-I (शैली: पंचायतन/महामारू) |
| विजय कटकातु | महाराणा राज सिंह की उपाधि (सेनाओं को जीतने वाला) |
| टीका दौड़ | राज सिंह ने मुगलों के थानों पर हमले के लिए यह रस्म शुरू की। |
| हाड़ी रानी का नाम | सेलह कंवर (सहज कंवर) |
निष्कर्ष
राज सिंह की मृत्यु (1680) के बाद मेवाड़ का गौरवमयी इतिहास धीरे-धीरे ढलान की ओर बढ़ा, लेकिन इन शूरवीरों की गाथाएं आज भी अरावली की पहाड़ियों में गूंजती हैं।
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