मेवाड़ के इतिहास में 28 फरवरी 1572 का दिन बहुत महत्वपूर्ण था। महाराणा उदय सिंह की मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन मेवाड़ की गद्दी किसे मिलेगी, इस पर संकट था। एक तरफ उदय सिंह के प्रिय पुत्र जगमाल थे, और दूसरी तरफ मेवाड़ की जनता और सामंतों की पसंद—प्रताप।
आखिरकार, सामंतों ने जगमाल को गद्दी से हटाया और मेवाड़ की बागडोर 32 वर्षीय प्रताप के हाथों में सौंपी। यहीं से शुरू हुई वह ऐतिहासिक लड़ाई जिसने मुगलों की नींद हराम कर दी।
आइये जानते हैं महाराणा प्रताप (1572-1597) की वीर गाथा, हल्दीघाटी का सच और चेतक की वफादारी की कहानी।
1. राज्याभिषेक और प्रतिज्ञा (Coronation And The Oath)
महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को कुम्भलगढ़ के ‘बादल महल’ में हुआ था। उनकी माता का नाम जयवंता बाई था।
- दो बार राज्याभिषेक:
- गोगुन्दा (Gogunda): 28 फरवरी 1572 को (होली के दिन) सामंतों ने तलवार बांधकर अनौपचारिक राज्याभिषेक किया।
- कुम्भलगढ़ (Kumbhalgarh): बाद में विधिवत रूप से राज्याभिषेक कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ, जिसमें मारवाड़ के राव चन्द्रसेन भी शामिल हुए।
- भीषण प्रतिज्ञा: राजा बनते ही प्रताप ने कसम खाई— “जब तक मैं चित्तौड़ को मुगलों से मुक्त नहीं करा लूँगा, तब तक न तो मैं थाली में भोजन करूँगा और न ही बिस्तर पर सोऊंगा।”
2. अकबर के 4 शांति दूत (Akbar’s 4 Diplomatic Missions)
अकबर जानता था कि चित्तौड़ जीतने के बाद भी मेवाड़ तब तक उसका नहीं होगा जब तक प्रताप सिर नहीं झुकाते। युद्ध से पहले अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए 4 दूत (Messengers) भेजे।
Exam Trick (याद रखने का क्रम – JMBT):
- J – जलाल खां (Jalal Khan): (नवंबर 1572) – सबसे पहले गया, असफल रहा।
- M – मान सिंह (Man Singh): (जून 1573) – आमेर के कुंवर। (उदय सागर झील की पाल पर मुलाकात हुई, लेकिन प्रताप ने मना कर दिया)।
- B – भगवंत दास (Bhagwant Das): (सितंबर 1573) – मान सिंह के पिता।
- T – टोडरमल (Todarmal): (दिसंबर 1573) – अकबर का वित्त मंत्री।
जब चारों प्रयास विफल हो गए, तो अकबर ने समझ लिया कि प्रताप बातों से नहीं, तलवार से मानेंगे।
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3. हल्दीघाटी का युद्ध (Battle of Haldighati – 18 June 1576)
यह युद्ध इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है।
- तारीख: 18 जून 1576 (इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा इसे 21 जून मानते हैं)।
- स्थान: खमनौर और गोगुन्दा के बीच की तंग घाटी, जहाँ की मिट्टी हल्दी जैसी पीली है।
- सेनापति: मुगलों की तरफ से मान सिंह (आमेर) और प्रताप की तरफ से हकीम खां सूर (पठान)।
यह युद्ध अनिर्णीत (Indecisive) रहा। अकबर का उद्देश्य प्रताप को पकड़ना या मारना था, और वह दोनों में असफल रहा।
- अबुल फज़ल ने इसे ‘खमनौर का युद्ध’ कहा।
- बदायूनी ने इसे ‘गोगुन्दा का युद्ध’ कहा।
- कर्नल टॉड ने इसे ‘मेवाड़ की थर्मोपल्ली’ (Thermopylae of Mewar) कहा।
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4. जंगल का संघर्ष और भामाशाह की मदद (Post-Haldighati Struggle)
हल्दीघाटी के बाद प्रताप ने पहाड़ों (Guerilla Warfare) से युद्ध जारी रखा। एक समय ऐसा आया जब प्रताप के परिवार को घास की रोटियाँ खानी पड़ीं।
- मेवाड़ का उद्धारक (Savior) – भामाशाह: जब प्रताप की आर्थिक स्थिति खराब हो गई, तब उनके मंत्री भामाशाह (और उनके भाई ताराचंद) ने अपनी पूरी संपत्ति प्रताप के चरणों में समर्पित कर दी। इससे प्रताप ने फिर से सेना तैयार की। (नोट: इसलिए भामाशाह को ‘मेवाड़ का दानवीर’ भी कहा जाता है)
5. दिवेर का युद्ध: मेवाड़ का मैराथन (Battle of Diver – 1582)
1582 ई. में प्रताप ने मुगलों पर भीषण पलटवार किया। राजसमंद के दिवेर (Diver) में मुगल थाने पर हमला किया।
- अमर सिंह का वार: प्रताप के पुत्र अमर सिंह ने मुगल सेनापति सुल्तान खां को भाले से ऐसा मारा कि भाला उसे और उसके घोड़े को चीरते हुए ज़मीन में जा धंसा।
- विजय: मुगलों में भगदड़ मच गई। कर्नल टॉड ने इस युद्ध को ‘मेवाड़ का मैराथन’ (Marathon of Mewar) कहा है।
6. चावंड और अंतिम समय (Chawand And Death)
1585 ई. में प्रताप ने चावंड (Chawand) को अपनी नई राजधानी बनाया, जो अगले 28 सालों तक मेवाड़ की राजधानी रही। यहाँ मेवाड़ की चित्रकला (चावंड शैली) का विकास हुआ।
मृत्यु (Death): 19 जनवरी 1597 को धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाते समय चोट लगने से 57 वर्ष की उम्र में इस महान योद्धा का निधन हो गया।
- समाधि: बाडोली (Baroli) में केजड़ बांध के किनारे 8 खंभों की छतरी बनी हुई है।
किंवदंती (Legend): कहा जाता है कि प्रताप की मृत्यु की खबर सुनकर अकबर की आँखों में भी आँसू आ गए थे, क्योंकि प्रताप ही एकमात्र ऐसा राजा था जिसने अकबर के सामने कभी सिर नहीं झुकाया।
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Quick Exam Fact Sheet
| तथ्य (Fact) | विवरण (Details) |
| बचपन का नाम | कीका (Kika – भीलों में छोटे बच्चे को कहते हैं) |
| घोड़ा और हाथी | घोड़ा: चेतक |
| प्रधान सेनापति | हकीम खां सूर (एकमात्र मुस्लिम सेनापति) |
| हल्दीघाटी उपनाम | मेवाड़ की थर्मोपल्ली (टॉड द्वारा) |
| दिवेर युद्ध उपनाम | मेवाड़ का मैराथन |
| दरबारी विद्वान | चक्रपाणि मिश्र (ग्रंथ: विश्व वल्लभ, मुहूर्त माला) |
Conclusion (निष्कर्ष)
महाराणा प्रताप का जीवन सिखाता है कि साधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन अगर आत्मबल (Willpower) हो, तो बड़े से बड़े साम्राज्य को भी घुटने टेकने पर मजबूर किया जा सकता है। उन्होंने महलों का सुख त्याग दिया, लेकिन स्वतंत्रता का सौदा नहीं किया।
प्रताप के बाद उनके पुत्र अमर सिंह गद्दी पर बैठे। क्या वे प्रताप के संघर्ष को जारी रख पाए या मुगलों से संधि कर ली?
Next Post में पढ़ें: मेवाड़-मुगल संधि और अमर सिंह का इतिहास (Mewar-Mughal Treaty & Reign of Amar Singh).
FAQs
Q1: हल्दीघाटी के युद्ध (1576) में असली जीत किसकी हुई थी? (Who actually won the Battle of Haldighati?)
Ans: ऐतिहासिक रूप से इसे अनिर्णीत (Indecisive) माना जाता था, क्योंकि अकबर का उद्देश्य महाराणा प्रताप को पकड़ना या मारना था, जिसमें वह असफल रहा। लेकिन, हाल ही में राजस्थान बोर्ड और कई इतिहासकारों ने नई रिसर्च के आधार पर माना है कि नैतिक रूप से और रणनीतिक रूप से जीत महाराणा प्रताप की हुई थी, क्योंकि मुगलों को पीछे हटकर गोगुन्दा में शरण लेनी पड़ी थी।
Q2: चित्तौड़गढ़ किले में कुल कितने साके (Saka) हुए? (How many Sakas took place in Chittorgarh?)
Ans: चित्तौड़गढ़ के इतिहास में कुल 3 प्रमुख साके हुए:
- 1303 ई.: अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय (रावल रतन सिंह और रानी पद्मिनी)।
- 1534-35 ई.: गुजरात के बहादुर शाह के आक्रमण के समय (रानी कर्मावती और बाघ सिंह)।
- 1568 ई.: अकबर के आक्रमण के समय (जयमल-फत्ता और फूल कंवर)।
Q3: ‘रावल’ और ‘राणा’ उपाधि में क्या अंतर है? (Difference between Rawal and Rana title)
Ans: गुहिल वंश की शुरुआती शाखा के राजा ‘रावल’ (जैसे बप्पा रावल, रावल रतन सिंह) कहलाते थे। 1303 में रावल शाखा समाप्त हो गई। 1326 में सिसोदा गाँव के हम्मीर ने जब दोबारा राज्य स्थापित किया, तो उन्होंने ‘राणा’ या ‘महाराणा’ (जैसे महाराणा कुंभा, महाराणा प्रताप) उपाधि का उपयोग शुरू किया। वे ‘सिसोदिया’ कहलाए।
Q4: मेवाड़ के किस शासक को ‘सिपाही का अंश’ कहा जाता है? (Who is known as Soldier’s Wreck?)
Ans: महाराणा सांगा (Maharana Sanga) को कर्नल जेम्स टॉड ने ‘सिपाही का अंश’ कहा है। उनके शरीर पर युद्ध के 80 घाव थे, उनकी एक आँख नहीं थी, एक हाथ नहीं था और वे एक पैर से लंगड़ाते थे, फिर भी वे एक महान योद्धा थे।
Q5: मेवाड़ के गुहिल वंश का वास्तविक संस्थापक कौन था? (Who was the real founder of Guhila Dynasty?)
Ans: गुहिल वंश की स्थापना 566 ई. में गुहादित्य ने की थी। लेकिन मेवाड़ राज्य का ‘वास्तविक संस्थापक’ (Real Founder) बप्पा रावल (कालभोज) को माना जाता है, क्योंकि उन्होंने ही 734 ई. में चित्तौड़ जीतकर उसे एक शक्तिशाली साम्राज्य बनाया था।




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