"Historical illustration of the Gurjar Pratihara Dynasty featuring Nagara-style temples, a fortified city, and a royal army with war elephants and cavalry."

गुर्जर-प्रतिहार वंश का इतिहास | Gurjar Pratihara Dynasty History in Hindi

1. प्रस्तावना

“जरा सोचिए! 8वीं सदी में जब अरब की सेनाएं पूरी दुनिया को जीतती हुई भारत के दरवाजे पर खड़ी थीं, तब वह कौन सी दीवार थी जिसने उन्हें 300 साल तक रोके रखा?

वह कोई पत्थरों की दीवार नहीं थी, वह थी—गुर्जर-प्रतिहारों की तलवारें। आज हम उसी महान वंश की कहानी जानेंगे, इतिहासकार आर.सी. मजूमदार ने इन्हें ‘भारत का द्वारपाल’ कहते हैं।”


2. ‘गुर्जर’ और ‘प्रतिहार’ शब्द का अर्थ

इस वंश के नामकरण को लेकर इतिहासकारों में मतभेद रहे हैं, लेकिन सर्वमान्य तथ्य निम्नलिखित हैं:

  • प्रतिहार: संस्कृत में ‘प्रतिहार’ का अर्थ होता है- ‘द्वारपाल’ या ‘रक्षक’। ग्वालियर अभिलेख के अनुसार, ये स्वयं को भगवान राम के भाई लक्ष्मण का वंशज मानते हैं, जिन्होंने राम के वनवास के समय ‘प्रतिहार’ (रक्षक) की भूमिका निभाई थी।
  • गुर्जर: यह शब्द संभवतः उस क्षेत्र का सूचक है जहाँ इनका शासन था। आधुनिक राजस्थान के जोधपुर और पाली क्षेत्र को प्राचीन काल में ‘गुर्जरत्रा’ (Gurjaratra) कहा जाता था। इस क्षेत्र का स्वामी होने के कारण उन्हें ‘गुर्जर-प्रतिहार’ कहा गया।

3. उत्पत्ति और मूल निवास स्थान

  • मूल स्थान: इनका मूल स्थान राजस्थान का मंडोर (जोधपुर) और भीनमाल (जालौर) माना जाता है।
  • शाखाएं: इतिहासकार मुहणोत नैणसी ने प्रतिहारों की 26 शाखाओं का उल्लेख किया है, जिनमें ‘मंडोर’ और ‘भीनमाल-उज्जैन’ शाखा सबसे प्रमुख थी।

4. ऐतिहासिक स्रोत

इस वंश के इतिहास को जानने के लिए हम मुख्य रूप से इन स्रोतों पर निर्भर हैं:

  1. ग्वालियर प्रशस्ति: यह मिहिर भोज द्वारा लिखवाया गया सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख है। इसमें वंशावली और विजयों का वर्णन है।
  2. घटियाला अभिलेख (861 ई.): यह जोधपुर के पास है, इससे मंडोर शाखा के शासक ‘कक्कुक प्रतिहार’ की उपलब्धियों, जैसे आभीरों का दमन और व्यापारिक हाट की स्थापना, की जानकारी मिलती है।”
  3. अरब यात्रियों का विवरण: सुलेमान (मिहिर भोज के समय) और अल-मसूदी (महिपाल के समय) ने इनके साम्राज्य की शक्ति का वर्णन किया है।
  4. साहित्यिक स्रोत: जैन ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ (उद्योतन सूरी) और राजशेखर के ग्रंथ (कर्पूरमंजरी, काव्यमीमांसा)।

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5. प्रमुख शासक और उनकी उपलब्धियां

इस वंश में कई वीर योद्धा हुए, लेकिन परीक्षा और इतिहास की दृष्टि से निम्नलिखित शासक अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

(A) नागभट्ट प्रथम (730 – 760 ई.) – वास्तविक संस्थापक

  • उपाधियाँ: नागावलोक, नारायण की मूर्ति का प्रतीक, ‘म्लेच्छों का नाशक’।
  • उपलब्धि: नागभट्ट प्रथम भीनमाल शाखा का प्रतापी शासक था। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि अरबों (सिंध के गवर्नर जुनैद) को हराना थी। ग्वालियर प्रशस्ति में उसे “म्लेच्छों का दमन करने वाला” कहा गया है। उसने अपनी राजधानी मंडोर से मेड़ता और फिर उज्जैन स्थानांतरित की।

(B) वत्सराज (775 – 800 ई.) – साम्राज्य निर्माता

  • उपाधि: ‘रणहस्तिन’ (युद्ध में हाथी के समान)।
  • कन्नौज पर दृष्टि: वत्सराज के समय ही भारत का प्रसिद्ध ‘त्रिपक्षीय संघर्ष’ (Tripartite Struggle) शुरू हुआ। उसने बंगाल के पाल शासक ‘धर्मपाल’ को हराया, लेकिन राष्ट्रकूट राजा ‘ध्रुव’ से हार गया।
  • साहित्य: इसी के समय उद्योतन सूरी ने जालौर दुर्ग में ‘कुवलयमाला’ (778 ई.) की रचना की।

(C) नागभट्ट द्वितीय (800 – 833 ई.)

  • कन्नौज विजय: इसने कन्नौज को जीतकर उसे अपनी स्थायी राजधानी बनाया।
  • गंगा समाधि: यह एक धार्मिक प्रवृत्ति का राजा था। अपने जीवन के अंतिम समय में इसने गंगा नदी (मुंगेर, बिहार के पास) में जल समाधि ले ली थी।
  • निर्माण: इसने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया जिसे अरबों ने नष्ट कर दिया था।

(D) मिहिर भोज (836 – 885 ई.) – वंश का सबसे महान शासक

  • परिचय: यह रामभद्र का पुत्र था और इस वंश का सबसे शक्तिशाली राजा माना जाता है।
  • उपाधियाँ:
    • आदिवराह: (ग्वालियर अभिलेख में)।
    • प्रभास: (दौलतपुर अभिलेख में)।
  • अरब यात्री सुलेमान: 851 ई. में भारत आया सुलेमान लिखता है कि “यह राजा (भोज) अरबों का सबसे बड़ा शत्रु है, उसके पास विशाल अश्व सेना है और उसके राज्य में चोरी-डकैती नहीं होती।”
  • सिक्के: इसने चांदी के ‘द्रम्म’ सिक्के चलाए जिन पर ‘श्रीमद आदिवराह’ लिखा होता था।

(E) महेंद्रपाल प्रथम (885 – 910 ई.) – साहित्य का संरक्षक

  • दरबारी कवि: प्रसिद्ध विद्वान राजशेखर इसी के दरबार में थे। राजशेखर ने उसे ‘रघुकुल चूड़ामणि’ और ‘निर्भयराज’ कहा है।
  • राजशेखर की रचनाएं: कर्पूरमंजरी, काव्यमीमांसा, बाल रामायण, भुवनकोश, हरविलास।

(E) महिपाल प्रथम (912 – 944 ई.)

  • इसके समय बगदाद निवासी अल-मसूदी (915 ई.) भारत आया। उसने प्रतिहारों को ‘अल-गुर्जर’ और राजा को ‘बौरा’ (आदिवराह का उच्चारण) कहा।
  • इसी के समय राष्ट्रकूट राजा इंद्र तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण कर उसे तहस-नहस कर दिया, जिससे वंश का पतन शुरू हुआ।

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6. त्रिपक्षीय संघर्ष (Tripartite Struggle)

यह संघर्ष कन्नौज (गंगा-यमुना दोआब) पर नियंत्रण के लिए हुआ था। यह लगभग 100 वर्षों तक चला।

  • तीन पक्ष:
    1. गुर्जर-प्रतिहार (उत्तर-पश्चिम भारत)
    2. पाल वंश (बंगाल)
    3. राष्ट्रकूट वंश (दक्षिण भारत)
  • परिणाम: अंततः इस संघर्ष में गुर्जर-प्रतिहारों की विजय हुई और कन्नौज पर उनका एकाधिकार हो गया।

7. सांस्कृतिक और स्थापत्य योगदान

प्रतिहारों ने वास्तुकला की एक नई शैली को जन्म दिया जिसे ‘महामारु शैली’ (Maha-Maru Style) या ‘गुर्जर-प्रतिहार शैली’ कहा जाता है।

प्रमुख मंदिर:

  1. ओसियां (जोधपुर): इसे ‘राजस्थान का भुवनेश्वर’ कहा जाता है। यहाँ का सूर्य मंदिर और हरिहर मंदिर प्रतिहार कालीन हैं।
  2. आभानेरी (दौसा): हर्षत माता का मंदिर।
  3. किराडू (बाड़मेर): सोमेश्वर मंदिर (इसे राजस्थान का खजुराहो कहते हैं)।
  4. दधिमति माता मंदिर: गोट मांगलोद (नागौर)।

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8. पतन के कारण

  1. लगातार युद्ध: राष्ट्रकूटों और पालों से 100 साल तक लड़ने के कारण इनकी आर्थिक और सैन्य शक्ति कमजोर हो गई।
  2. सामंतों का उदय: परमार, चौहान, चंदेल और सोलंकी जो पहले प्रतिहारों के सामंत थे, उन्होंने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी।
  3. विदेशी आक्रमण: 1018 ई. में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया। तत्कालीन शासक ‘राज्यपाल’ भाग खड़ा हुआ, जिससे इस वंश की प्रतिष्ठा धूल में मिल गई।
  4. अंतिम शासक: इस वंश का अंतिम शासक यशपाल (1036 ई.) था, जिसके बाद गड़वालों ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया।

“अगर आप राजस्थान का पूरा इतिहास पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी [Rajasthan History Guide] पढ़ें।”

9. निष्कर्ष

गुर्जर-प्रतिहार वंश न केवल अपनी सैन्य उपलब्धियों के लिए, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिए भी याद किया जाता है। उन्होंने जिस समय भारत की बागडोर संभाली, वह संक्रमण का काल था। यदि प्रतिहारों ने 300 वर्षों तक अरबों को सिंध से आगे बढ़ने से न रोका होता, तो भारत का इतिहास और भूगोल आज कुछ और ही होता। उनकी वास्तुकला आज भी राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदिरों में जीवित है।

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