Horizontal infographic timeline titled 'Journey of Marwar' in Hindi, featuring 5 illustrations of rulers: Rao Jodha, Rao Maldeo, Rao Chandrasen, Veer Durgadas, and Maharaja Hanwant Singh signing the accession instrument.

A comprehensive history of Marwar: from the rise of the Rathore dynasty to its integration into the Indian Union.

राजस्थान के पश्चिमी भाग में स्थित मारवाड़, जिसे प्राचीन काल में ‘मरुवार’ (मृत्यु का क्षेत्र) या ‘मरुस्थल’ कहा जाता था, भारतीय इतिहास में केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि शौर्य, बलिदान और राजनीतिक कूटनीति का एक जीवंत प्रतीक है। यह शोध प्रतिवेदन मारवाड़ के राठौड़ राजवंश के इतिहास का एक व्यापक, विश्लेषणात्मक और विस्तृत रोडमैप प्रस्तुत करता है। यह दस्तावेज 13वीं शताब्दी में राव सीहा के आगमन से लेकर 1947 में महाराजा हनुवंत सिंह द्वारा भारत में विलय तक की सात शताब्दियों की लंबी यात्रा को पांच प्रमुख कालखंडों में विभाजित करता है।

Table of Contents

भाग 1: उत्पत्ति एवं स्थापना (1243 ई. – 1489 ई.)

मारवाड़ के राठौड़ वंश की स्थापना एक आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि यह मध्यकालीन भारत में तुर्क आक्रमणों के कारण हुए बड़े पैमाने पर विस्थापन और पुनर्वास की प्रक्रिया का परिणाम थी।

1.1 राठौड़ वंश की उत्पत्ति: ऐतिहासिक विवाद और निष्कर्ष

राठौड़ों की उत्पत्ति का प्रश्न इतिहासकारों के बीच सदैव विवाद का विषय रहा है। मुख्य रूप से दो सिद्धांत प्रचलित हैं:

  1. बदायूं के राष्ट्रकूट: कर्नल जेम्स टॉड और कुछ अन्य विद्वानों ने राठौड़ों को बदायूं के राष्ट्रकूटों से जोड़ा है। उनका तर्क है कि ‘राठौड़’ शब्द संस्कृत के ‘राष्ट्रकूट’ का अपभ्रंश है ।

2. कन्नौज के गहड़वाल:

यह मत अधिक ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों द्वारा समर्थित है। जोधपुर राज्य की ख्यात, मुह्नोत नैणसी की ख्यात और पृथ्वीराज रासो जैसे स्रोतों के अनुसार, राठौड़ कन्नौज के शासक जयचंद गहड़वाल के वंशज हैं । 1194 ई. में चंदावर के युद्ध में मोहम्मद गौरी के हाथों जयचंद की पराजय के बाद, उनके पौत्र राव सीहा ने पश्चिम की ओर पलायन किया। आधुनिक इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा भी इसी मत का समर्थन करते हैं ।

1.2 राव सीहा: मरुधर में राज्य की नींव (1243-1273 ई.)

राव सीहा को मारवाड़ के राठौड़ वंश का ‘आदि पुरुष’ या संस्थापक माना जाता है। उनका आगमन 13वीं शताब्दी के मध्य में हुआ, जब मारवाड़ विभिन्न छोटी जनजातियों और स्थानीय सरदारों (जैसे गोहिल, डाभी, और चौहानों) के नियंत्रण में था।

पालीवाल ब्राह्मणों का संरक्षण: राव सीहा के प्रारंभिक संघर्ष का केंद्र पाली था। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, पाली एक समृद्ध व्यापारिक केंद्र था, जिस पर मेर और मीणा जनजातियों के लुटेरे अक्सर आक्रमण करते थे। पालीवाल ब्राह्मणों ने अपनी रक्षा के लिए राव सीहा से सहायता मांगी। 1243 ई. के आसपास, सीहा ने पाली में व्यवस्था स्थापित की और इसे अपना प्रारंभिक केंद्र बनाया ।

  • लाखा झंवर का युद्ध: राव सीहा ने केवल लुटेरों से ही नहीं, बल्कि मुस्लिम आक्रमणकारियों से भी संघर्ष किया। 1273 ई. का ‘बिट्ठू शिलालेख’ (पाली) इस बात की पुष्टि करता है कि राव सीहा ‘म्लेच्छों’ (संभवतः नसीरुद्दीन महमूद या बलबन की सेना) के विरुद्ध गायों की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी रानी पार्वती सोलंकी उनके साथ सती हुई थीं ।

विश्लेषण: राव सीहा का काल राज्य विस्तार का नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व रक्षा’ और ‘जड़ें जमाने’ का काल था। उन्होंने स्थानीय ब्राह्मणों और महाजनों का विश्वास जीतकर राठौड़ सत्ता की सामाजिक वैधता (Social Legitimacy) स्थापित की।

1.3 राव चूंडा: मंडोर विजय और सामंतवाद का उदय

राव सीहा के बाद कई पीढ़ियों तक संघर्ष चलता रहा। राव चूंडा (1384-1428 ई.) ने राठौड़ शक्ति को एक संगठित राज्य में बदला।

  • मंडोर की प्राप्ति (दहेज और कूटनीति): 14वीं शताब्दी के अंत तक, मंडोर पर इंदा प्रतिहारों का शासन था, लेकिन वे मालवा के सुबेदारों और तुर्क आक्रमणों से परेशान थे। अपनी कमजोरी को भांपते हुए, इंदा प्रतिहारों ने राव चूंडा के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए और अपनी पुत्री का विवाह उनसे कर दिया। दहेज के रूप में, उन्होंने मंडोर का दुर्ग चूंडा को सौंप दिया। यह एक ऐतिहासिक मोड़ था, क्योंकि राठौड़ों को पहली बार एक सुरक्षित राजधानी प्राप्त हुई ।
  • साम्राज्य विस्तार: मंडोर मिलने के बाद, चूंडा ने खाटू, डीडवाना, सांभर, अजमेर और नाडोल पर अधिकार कर लिया।
  • सामंत प्रथा (Feudal System): राव चूंडा ने अपने भाइयों और पुत्रों को विजित क्षेत्रों में जागीरें बांटने की प्रथा शुरू की। इसे ‘भाई-बांट’ कहा गया। यद्यपि इसने राज्य का विस्तार किया, लेकिन इसने भविष्य के उत्तराधिकार संघर्षों के बीज भी बो दिए। चूंडा ने अपनी रानी मोहिलानी के प्रभाव में आकर अपने ज्येष्ठ पुत्र रणमल के बजाय कनिष्ठ पुत्र कान्हा को उत्तराधिकारी घोषित किया, जिससे रणमल मेवाड़ चले गए ।

1.4 राव जोधा: 15 वर्षों का वनवास और जोधपुर की स्थापना

रणमल की मेवाड़ में हत्या (1438 ई.) के बाद, उनके पुत्र राव जोधा को जान बचाकर भागना पड़ा। मेवाड़ की सेना ने मंडोर पर अधिकार कर लिया।

  • संघर्ष का काल (1438-1453 ई.): जोधा ने 15 वर्षों तक बीकानेर के पास काहूनी गांव और मारवाड़ के जंगलों में शरण ली। उन्होंने अपनी शक्ति को पुनर्गठित किया और गुरिल्ला युद्ध जारी रखा।
  • आवल-बावल की संधि (1453 ई.): अंततः, मेवाड़ और मारवाड़ के बीच सीमा निर्धारण के लिए हंसाबाई (जोधा की बुआ और मेवाड़ की राजमाता) की मध्यस्थता में ‘आवल-बावल’ की संधि हुई। इसके तहत सोजत को सीमा माना गया और जोधा की पुत्री श्रृंगार देवी का विवाह महाराणा कुंभा के पुत्र रायमल से हुआ। इससे मंडोर पर जोधा का अधिकार पुनः स्थापित हुआ ।

1.4.1 मेहरानगढ़ की नींव और चिड़ियाटूंक की कथा

मंडोर सुरक्षा की दृष्टि से पर्याप्त नहीं था। इसलिए, 12 मई 1459 को राव जोधा ने एक नई राजधानी की नींव रखी – जोधपुर

  • चिड़ियाटूंक पहाड़ी: उन्होंने चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर एक विशाल दुर्ग का निर्माण शुरू किया, जिसे ‘मेहरानगढ़’ (सूर्य का किला/मिहिर-गढ़) नाम दिया गया। राठौड़ स्वयं को सूर्यवंशी मानते हैं, इसलिए यह नाम रखा गया ।
  • श्राप और बलिदान: निर्माण के दौरान, वहां तपस्या कर रहे एक योगी ‘चिड़िया नाथ’ को जबरन हटाया गया। क्रोधित होकर उन्होंने श्राप दिया: “जोधा! तुम्हारे गढ़ में सदैव पानी की कमी रहेगी।” इस श्राप के प्रभाव को कम करने के लिए, राजाराम मेघवाल (रजिया भांबी) नामक व्यक्ति ने स्वेच्छा से नींव में जीवित समाधि ली। उनके बलिदान को आज भी किले में एक स्मारक के रूप में याद किया जाता है ।
  • कुलदेवी की स्थापना: जोधा ने मंडोर से अपनी कुलदेवी नागणेची माता और इष्टदेवी चामुंडा माता की मूर्तियों को लाकर मेहरानगढ़ में स्थापित किया। चामुंडा माता आज भी जोधपुर के राजपरिवार और नागरिकों की आराध्य देवी हैं ।

जाने – कछवाहा वंश की उत्पत्ति से लेकर एकीकरण

भाग 2: राव मालदेव: शौर्य, विस्तार और त्रासदी (1531 ई. – 1562 ई.) (The Era of Expansion: Imperial Ambitions and Personal Tragedies)

राव मालदेव का शासनकाल मारवाड़ के इतिहास का चरमोत्कर्ष था। फारसी इतिहासकार अबुल फजल और निजामुद्दीन अहमद ने उन्हें “हिंदुस्तान का सबसे शक्तिशाली राजा” (Hashmat Wala Raja) कहा है । जब मालदेव गद्दी पर बैठे, तो उनके पास केवल जोधपुर और सोजत के परगने थे, लेकिन अपने शौर्य से उन्होंने इसे 52 युद्धों के माध्यम से 58 परगनों वाले विशाल साम्राज्य में बदल दिया।

2.1 52 युद्धों का विजेता और साम्राज्य विस्तार

मालदेव ने पारंपरिक राजपूत नीति ‘जियो और जीने दो’ के विपरीत ‘राज्य विस्तार’ की आक्रामक नीति अपनाई। उन्होंने अपने पड़ोसियों, यहां तक कि अपने ही स्वजातीय बंधुओं को भी नहीं बख्शा।

  • प्रमुख विजयें:
  1. भद्राजूण (1531): वीरा को हराकर।
  2. नागौर (1533): दौलत खान को पराजित किया।
  3. मेड़ता (1535): वीरमदेव को हराकर मेड़ता छीना।
  4. सिवाणा (1538): डूंगरसी को हराकर।
  5. जालौर और सांचौर: सिकंदर खान और बीदा को हराकर ।
  • पाहेबा/साहेबा का युद्ध (1541 ई.): यह युद्ध राजपूत एकता के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। मालदेव ने बीकानेर के राव जैतसी (राठौड़ वंश की दूसरी शाखा) पर आक्रमण किया। इस युद्ध में राव जैतसी मारे गए और बीकानेर पर मालदेव का अधिकार हो गया। जैतसी के पुत्र कल्याणमल और मेड़ता के वीरमदेव ने शेरशाह सूरी से सहायता मांगी, जिसने भविष्य के विनाश की नींव रखी ।

2.2 गिरी सुमेल का युद्ध (जनवरी 1544 ई.): शौर्य और छल की गाथा

हुमायूं को भारत से खदेड़ने के बाद, अफगान शासक शेरशाह सूरी की नजर मारवाड़ पर थी। 80,000 की विशाल अफगान सेना और 12,000 की मारवाड़ सेना के बीच यह युद्ध पाली के जैतारण के पास गिरी और सुमेल गांवों के मध्य लड़ा गया।

  • शेरशाह का कूटनीतिक छल: शेरशाह जानता था कि सीधी लड़ाई में राजपूतों को हराना मुश्किल है। उसने मालदेव के सेनापतियों (जेता और कूपा) के तंबुओं में जाली पत्र फिंकवाए, जिनमें लिखा था कि वे शेरशाह से मिल चुके हैं। मालदेव को संदेह हुआ और वे मुख्य सेना लेकर युद्धभूमि से हट गए ।
  • जेता और कूपा का बलिदान: अपने ऊपर लगे गद्दारी के कलंक को धोने के लिए, जेता और कूपा ने अपनी छोटी सी टुकड़ी के साथ शेरशाह की सेना पर आत्मघाती हमला बोल दिया। राजपूतों का आक्रमण इतना भीषण था कि शेरशाह की सेना भागने ही वाली थी।
  • जलाल खान की रिजर्व टुकड़ी: युद्ध के अंतिम क्षणों में, जलाल खान जलवानी की आरक्षित सेना ने पीछे से हमला किया, जिससे पासा पलट गया। जेता और कूपा लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

शेरशाह का प्रसिद्ध कथन: विजय तो मिली, लेकिन भारी नुकसान के बाद। शेरशाह ने अपने पसीने पोंछते हुए कहा:“बोल्यो सूरी राज यूं, गिरी घाट घमसाण। मुट्ठी खातर बाजरी, खो देतो हिंदवाण।” (मैं मुट्ठी भर बाजरे [मारवाड़ की बंजर भूमि] के लिए पूरे हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता)

2.3 रूठी रानी (उमादे) का प्रसंग

राव मालदेव के व्यक्तिगत जीवन की यह घटना राजस्थानी लोकगाथाओं में अमर है। उमादे, जैसलमेर के रावल लूणकरण की पुत्री थीं।

  • विवाद का कारण: विवाह की पहली रात (सुहागरात) को मालदेव नशे में धुत्त होकर उमादे की दासी भारमली के पास चले गए। स्वाभिमानी उमादे ने इसे अपना अपमान समझा और आजीवन राजा से ‘रूठ’ गईं ।
  • समझौते का प्रयास और आशा बारहट के दोहे: सरदारों के समझाने पर एक बार उमादे जोधपुर लौटने को तैयार हुईं। लेकिन अन्य रानियों को डर था कि उमादे के आते ही उनका प्रभाव कम हो जाएगा। उन्होंने कवि आशा बारहट को उमादे के स्वाभिमान को ललकारने के लिए भेजा। आशा बारहट ने यह दोहा पढ़ा:“मान रखे तो पीव तज, पीव रखे तज मान। दोय गयंद न बंध ही, एकण खंभे ठान।” (यदि मान रखना है तो पति को त्याग दे, और यदि पति चाहिए तो मान को त्याग दे। एक खूंटे पर दो हाथी नहीं बंध सकते।) इस दोहे को सुनकर उमादे पुनः लौट गईं और आजीवन अजमेर के तारागढ़ में रहीं।
  • महा-सती: 1562 में मालदेव की मृत्यु के बाद, उमादे उनके शव के साथ नहीं, बल्कि उनकी पगड़ी के साथ सती हुईं। इसे ‘महा-सती’ कहा जाता है ।

भाग 3: राव चंद्रसेन: मारवाड़ का विस्मृत नायक (1562 ई. – 1581 ई.) (Rao Chandrasen: The Forgotten Hero and Precursor to Pratap)

राव मालदेव की मृत्यु के बाद, मारवाड़ में उत्तराधिकार का खूनी संघर्ष शुरू हुआ। मालदेव ने अपने बड़े पुत्रों (राम और उदय सिंह) को अयोग्य मानकर अपने तीसरे पुत्र चंद्रसेन को उत्तराधिकारी चुना। इससे नाराज होकर राम और उदय सिंह अकबर की शरण में चले गए।

3.1 नागौर दरबार (1570 ई.) और प्रतिरोध का आरंभ

1570 में, अकबर ने अकाल राहत के बहाने नागौर में एक शाही दरबार आयोजित किया। इसका वास्तविक उद्देश्य राजपूताना के राजाओं की वफादारी परखना था।

  • दरबार का दृश्य: बीकानेर के कल्याणमल और जैसलमेर के हरराज ने अपनी पुत्रियों का विवाह अकबर से कर अधीनता स्वीकार कर ली। राव चंद्रसेन भी स्थिति का जायजा लेने दरबार में पहुंचे।
  • चंद्रसेन का निर्णय: वहां उन्होंने देखा कि अकबर का झुकाव उनके विरोधी भाई उदय सिंह (मोटा राजा) की ओर है और मुगलों का उद्देश्य केवल अधीनता है, सम्मान नहीं। चंद्रसेन ने बिना किसी संधि के दरबार छोड़ दिया। यह अकबर के लिए सीधा अपमान था ।

3.2 मुगलों से संघर्ष और छापामार युद्ध

अकबर ने तुरंत बीकानेर के रायसिंह को जोधपुर पर आक्रमण करने भेजा और जोधपुर को ‘खालसा’ (केंद्र शासित) घोषित कर दिया। चंद्रसेन को जोधपुर छोड़ना पड़ा।

  • संघर्ष के केंद्र: चंद्रसेन ने भाद्राजूण, सिवाणा, पीपलूंद और कानुजा की पहाड़ियों को अपना केंद्र बनाया।
  • रणनीति: उन्होंने मुगलों के खिलाफ ‘छापामार युद्ध’ (Guerrilla Warfare) की नीति अपनाई। वे मुगलों की रसद लाइनों को काटते और उनकी सेना को पहाड़ों में उलझाए रखते।
  • कष्टमय जीवन: चंद्रसेन का जीवन अत्यंत कष्टमय रहा। उन्हें अपने गहने और बर्तन तक बेचने पड़े। एक समय ऐसा आया जब उन्हें ‘जंगली कंदमूल’ खाकर गुजारा करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अधीनता स्वीकार नहीं की।

3.3 महाराणा प्रताप से तुलना और ऐतिहासिक महत्व

इतिहासकारों ने राव चंद्रसेन को “मारवाड़ का प्रताप” और “प्रताप का अग्रगामी” (Forerunner of Pratap) कहा है ।

  • समानताएं: दोनों ने महलों का त्याग किया, जंगलों में भटके, और मुगलों के सामने सिर नहीं झुकाया।
  • अंतर: प्रताप को मेवाड़ का पहाड़ी भूगोल (अरावली) और भामाशाह जैसा दानवीर मिला। चंद्रसेन को मारवाड़ के खुले मरुस्थल में लड़ना पड़ा और उन्हें अपने भाइयों का भी विरोध झेलना पड़ा। इसलिए, इतिहास ने उन्हें वह स्थान नहीं दिया जिसके वे हकदार थे, और वे ‘विस्मृत नायक’ (Forgotten Hero) कहलाए।

भाग 4: मुगल संबंध और 30 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम (1583 ई. – 1707 ई.) (Mughal Alliances and the War of Independence)

चंद्रसेन की मृत्यु (1581) के बाद, मारवाड़ ने मुगलों के साथ सहयोग के एक नए युग में प्रवेश किया, जो औरंगजेब के समय फिर से भीषण संघर्ष में बदल गया।

4.1 मोटा राजा उदय सिंह और वैवाहिक गठबंधन

1583 में, अकबर ने चंद्रसेन के बड़े भाई उदय सिंह को जोधपुर का शासक नियुक्त किया और उन्हें ‘मोटा राजा’ की उपाधि दी।

  • जोधा बाई का विवाह: उदय सिंह ने अपनी पुत्री ‘मानी बाई’ (जिसे इतिहास में जोधा बाई या जगत गोसाईं के नाम से जाना जाता है) का विवाह जहांगीर से किया। खुर्रम (शाहजहां) इन्हीं का पुत्र था। इस विवाह ने मारवाड़ और मुगलों के संबंधों को प्रगाढ़ किया और मारवाड़ को मुगल दरबार में शक्तिशाली स्थिति दिलाई ।

4.2 महाराजा जसवंत सिंह प्रथम (1638-1678 ई.)

जसवंत सिंह शाहजहां के सबसे विश्वासपात्र सेनापतियों में से एक थे।

  • धर्मत का युद्ध (1658 ई.): मुगल उत्तराधिकार युद्ध में, जसवंत सिंह ने दारा शिकोह की ओर से औरंगजेब के खिलाफ धर्मत (उज्जैन) का युद्ध लड़ा। कासिम खान के विश्वासघात के कारण उन्हें पराजित होकर लौटना पड़ा।
  • हाड़ी रानी का प्रसंग: जब जसवंत सिंह जोधपुर लौटे, तो उनकी रानी जसवंत दे (बूंदी के हाड़ा शासक की पुत्री) ने किले के द्वार बंद करवा दिए। उन्होंने संदेश भिजवाया: “राजपूत या तो युद्ध जीत कर आते हैं या मर कर। पराजित पति का मैं मुंह नहीं देखूंगी।” बाद में, राजा के दोबारा युद्ध पर जाने के वचन के बाद ही दरवाजे खोले गए। यह घटना क्षत्राणी धर्म का सर्वोच्च उदाहरण है ।

4.3 जसवंत सिंह की मृत्यु और खालसा

1678 में जमरूद (अफगानिस्तान) में जसवंत सिंह की मृत्यु हुई। उनकी मृत्यु पर औरंगजेब ने कहा: “आज कुफ्र का दरवाजा टूट गया” (Today the door of infidelity is broken)। चूंकि जसवंत सिंह का कोई जीवित उत्तराधिकारी नहीं था, औरंगजेब ने जोधपुर को खालसा घोषित कर दिया और वहां जजिया कर लगा दिया ।

4.4 वीर दुर्गादास राठौड़ और 30 वर्षीय संघर्ष (1679-1707 ई.)

जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद उनकी दो रानियों ने लाहौर में दो पुत्रों (अजीत सिंह और दलथंभन) को जन्म दिया। औरंगजेब ने उन्हें दिल्ली बुलाया और इस्लाम स्वीकार करने की शर्त पर राज्य देने का प्रस्ताव रखा। यहीं से दुर्गादास राठौड़ का अभ्युदय हुआ।

  • अजीत सिंह की रक्षा (गोरा धाय का बलिदान): दुर्गादास ने अजीत सिंह को औरंगजेब की कैद (रूप सिंह राठौड़ की हवेली) से निकालने की योजना बनाई। इसमें गोरा धाय ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मेवाड़ की पन्ना धाय की तरह, गोरा धाय ने सफाईकर्मी का वेश धारण कर अजीत सिंह को टोकरी में छिपाकर बाहर निकाला और अपने पुत्र का बलिदान दिया ।
  • राठौड़-सिसोदिया गठबंधन: दुर्गादास ने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह के साथ गठबंधन किया। यह पहली बार था जब राठौड़ और सिसोदिया मुगलों के खिलाफ एक साथ आए।
  • संघर्ष: दुर्गादास ने 30 वर्षों तक अथक संघर्ष किया। उन्होंने शहजादा अकबर (औरंगजेब का पुत्र) को भी अपनी ओर मिलाया। कर्नल टॉड ने दुर्गादास को “राठौड़ों का यूलिसिस” (Ulysses of Rathores) कहा है। उनके बारे में एक प्रसिद्ध दोहा है:“मायड़ एड़ा पूत जण, जेड़ा दुर्गादास। भार मंडासो थामियो, बिन थांभा आकाश।” (हे माता! दुर्गादास जैसा पुत्र जन, जिसने बिना खंभे के ही मारवाड़ रूपी आकाश को अपने कंधों पर थाम लिया।) ।

1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद, दुर्गादास ने अंततः अजीत सिंह को जोधपुर के सिंहासन पर बैठाया।

भाग 5: एकीकरण: पेन-पिस्तौल और भारत में विलय (1947 ई.) (Integration: The Dramatic Accession of Jodhpur)

1818 की संधियों के बाद मारवाड़ ब्रिटिश संरक्षण में रहा। लेकिन 1947 में भारत की स्वतंत्रता के समय, जोधपुर एक बार फिर इतिहास के चौराहे पर खड़ा था।

5.1 महाराजा हनुवंत सिंह और पाकिस्तान का प्रलोभन

जोधपुर के युवा और महत्वाकांक्षी महाराजा हनुवंत सिंह (उम्र 24 वर्ष) गद्दी पर थे। जोधपुर की सीमा नव-निर्मित पाकिस्तान से लगती थी।

  • जिन्ना की पेशकश: भोपाल के नवाब की मध्यस्थता में हनुवंत सिंह की मोहम्मद अली जिन्ना से दिल्ली में मुलाकात हुई। जिन्ना ने एक कोरा कागज (Blank Paper) मेज पर रख दिया और कहा: “आप अपनी शर्तें भर लें, मैं हस्ताक्षर कर दूंगा।”
  • प्रलोभन: कराची बंदरगाह का पूर्ण उपयोग, रेलवे का नियंत्रण, हथियारों के आयात की छूट, और अकाल के दौरान अनाज की आपूर्ति ।
  • हिंदू बनाम राज्य हित: हनुवंत सिंह का तर्क था कि कांग्रेस राजाओं के अधिकारों को समाप्त कर देगी, जबकि पाकिस्तान में वे स्वायत्त रह सकते हैं। जैसलमेर के महाराजकुमार गिरधारी सिंह ने एक यक्ष प्रश्न पूछा: “यदि भविष्य में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच युद्ध हुआ, तो आप किसका साथ देंगे?” इस प्रश्न ने हनुवंत सिंह को झकझोर दिया ।

5.2 वी.पी. मेनन, माउंटबेटन और विलय पत्र

सरदार पटेल ने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए वी.पी. मेनन और लॉर्ड माउंटबेटन को सक्रिय किया। माउंटबेटन ने हनुवंत सिंह को समझाया कि एक हिंदू बहुल राज्य का पाकिस्तान में जाना साप्रदायिक दंगे भड़का सकता है और यह उनके वंश के लिए घातक होगा।

5.3 ऐतिहासिक ‘पेन-पिस्तौल’ घटना (The Pen-Pistol Incident)

11 अगस्त 1947 को दिल्ली में विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद एक अत्यंत नाटकीय घटना घटी।

  • घटनाक्रम: हस्ताक्षर करने के बाद, जब माउंटबेटन कमरे से बाहर गए, तो हनुवंत सिंह ने अपनी जेब से एक विशेष पेन निकाला। यह पेन वास्तव में एक .22 कैलिबर की पिस्तौल थी। उन्होंने इसे वी.पी. मेनन की गर्दन पर तान दिया और क्रोध में चिल्लाए:“I refuse to accept your dictation!” (मैं तुम्हारी धौंस स्वीकार नहीं करूंगा!)

समाधान: तभी माउंटबेटन वापस आए। उन्होंने अत्यंत शांति से हनुवंत सिंह की कलाई पकड़ी और कहा, “हनुवंत, यह बचपना बंद करो।” उन्होंने पिस्तौल ले ली। बाद में, माउंटबेटन ने इसे ‘मैजिक ट्रिक’ बताकर बात को संभाल लिया। यह पेन-पिस्तौल आज भी इतिहास का हिस्सा है ।

अंततः, 30 मार्च 1949 को जोधपुर राज्य का औपचारिक रूप से वृहद् राजस्थान में विलय हो गया।

निष्कर्ष: मारवाड़ की अमिट विरासत

मारवाड़ का इतिहास केवल युद्धों का लेखा-जोखा नहीं है। यह एक बंजर भूमि में मानवीय जिजीविषा (Resilience) की विजय गाथा है।

  1. सांस्कृतिक योगदान: डिंगल भाषा का साहित्य, ढोला-मारू के प्रेम गीत, और मीरां बाई (जो मेड़ता के राठौड़ वंश की थीं) की भक्ति ने भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया है ।
  2. स्थापत्य कला: मेहरानगढ़ दुर्ग आज भी अपनी अभेद्यता और सुंदरता के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
  3. मूल्य: राव चंद्रसेन का स्वाभिमान, दुर्गादास की स्वामीभक्ति, पन्ना-गोरा धाय का बलिदान, और हाड़ी रानी का शौर्य – ये ऐसे मूल्य हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं।

राठौड़ वंश ने कन्नौज से निकलकर मरुधर में जो पौधा रोपा था, वह शताब्दियों के आंधी-तूफानों को झेलकर एक विशाल वटवृक्ष बना और अंततः आधुनिक भारत के निर्माण में समाहित हो गया।

परिशिष्ट: सांख्यिकीय और कालानुक्रमिक विवरण

तालिका 1: मारवाड़ के प्रमुख शासक और उनका कालक्रम

शासकशासनकालप्रमुख योगदान/घटना
राव सीहा1240-1273राठौड़ वंश की स्थापना, पाली और बिट्ठू शिलालेख।
राव चूंडा1384-1428मंडोर को राजधानी बनाया, सामंत प्रथा की शुरुआत।
राव जोधा1438-1489जोधपुर शहर (1459) और मेहरानगढ़ की स्थापना।
राव मालदेव1531-156252 युद्धों के विजेता, गिरी सुमेल युद्ध (1544)।
राव चंद्रसेन1562-1581मारवाड़ का प्रताप, मुगलों से आजीवन संघर्ष।
मोटा राजा उदय सिंह1583-1595मुगलों से प्रथम वैवाहिक संबंध (मानी बाई का विवाह)।
जसवंत सिंह I1638-1678धर्मत का युद्ध, औरंगजेब के साथ जटिल संबंध।
अजीत सिंह1679-1724दुर्गादास के प्रयासों से पुनर्स्थापना, मुगल कैद से मुक्ति।
हनुवंत सिंह1947-1952भारत में विलय, पेन-पिस्तौल घटना।

तालिका 2: मारवाड़ के निर्णायक युद्ध

युद्धवर्षकिसके मध्यपरिणामऐतिहासिक महत्व
लाखा झंवर1273राव सीहा बनाम तुर्क/स्थानीयराव सीहा की मृत्युराठौड़ों का प्रथम बड़ा बलिदान।
साहेबा/पाहेबा1541मालदेव बनाम राव जैतसीमालदेव की विजयबीकानेर-जोधपुर शत्रुता का आरंभ।
गिरी सुमेल1544मालदेव बनाम शेरशाह सूरीशेरशाह की कठिन विजयराजपूताना पर अफगान प्रभाव, शेरशाह का प्रसिद्ध कथन।
धर्मत1658जसवंत सिंह बनाम औरंगजेबऔरंगजेब की विजयऔरंगजेब का मुगल सत्ता पर कब्जा।
जोधपुर मुक्ति संग्राम1679-1707दुर्गादास बनाम मुगलराठौड़ों की विजयमारवाड़ की स्वतंत्रता की पुनर्स्थापना।

तालिका 3: भारत में विलय के दौरान जोधपुर की मांगें बनाम वास्तविकता

मांग (हनुवंत सिंह/जिन्ना प्रस्ताव)वास्तविकता (भारत सरकार/पटेल)
कराची बंदरगाह का उपयोगअस्वीकृत (काच्छु-भुज के माध्यम से रेल संपर्क का वादा)।
हथियारों के आयात की छूटअस्वीकृत (रक्षा केंद्र का विषय)।
जोधपुर-हैदराबाद (सिंध) रेलवेअस्वीकृत (भारतीय रेलवे का एकीकरण)।
अकाल राहत (अनाज)भारत सरकार द्वारा पूर्ण सहायता का आश्वासन।

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