राजस्थान के इतिहास में ‘मेवाड़’ अगर स्वाभिमान और संघर्ष का प्रतीक है, तो ‘आमेर’ (जयपुर) कूटनीति (Diplomacy), शक्ति और स्थापत्य कला का बेजोड़ उदाहरण है। आमेर के कछवाहा वंश (Kachhwaha Dynasty) ने न केवल राजस्थान बल्कि पूरे मुगल साम्राज्य की राजनीति को प्रभावित किया।
चाहे वह राजा मान सिंह की तलवार हो जिसने काबुल से बंगाल तक मुगलों का झंडा फहराया, या सवाई जयसिंह की दूरदर्शिता जिसने दुनिया को ‘जंतर-मंतर’ और ‘जयपुर’ जैसा शहर दिया—इस वंश का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है।
इस विस्तृत लेख (Detailed Guide) में हम कछवाहा वंश की स्थापना (1137 ई.) से लेकर राजस्थान में विलय (1949 ई.) तक के हर पहलू को गहराई से जानेंगे।
अध्याय 1: कछवाहा वंश का उदय और आमेर की स्थापना (Origin & Early History)
इतिहासकारों के अनुसार, आमेर का शासक वर्ग खुद को भगवान राम के पुत्र ‘कुश’ का वंशज मानता है, इसलिए इन्हें ‘कुशवाहा’ या कालांतर में ‘कछवाहा’ कहा गया। इनका मूल स्थान अयोध्या से निकलकर मध्य प्रदेश (नरवर/ग्वालियर) और फिर राजस्थान आया।
1. साम्राज्य की नींव: दूल्हराय (Dulharai)
कछवाहा वंश की वास्तविक शुरुआत तेजकरण (जिन्हें दूल्हराय कहा जाता था) ने की।
- दौसा पर अधिकार: 1137 ई. के आसपास दूल्हराय ने बड़गूजरों को हराकर दौसा (Dausa) पर अधिकार किया और उसे अपनी पहली राजधानी बनाया।
- जमवाय माता: इन्होंने मांची के पास मीणाओं को हराकर ‘रामगढ़’ बसाया और अपनी कुलदेवी ‘जमवाय माता’ का मंदिर बनवाया। आज भी कछवाहा वंश की कुलदेवी जमवाय माता ही हैं।
2. आमेर का राजधानी बनना: कोकिलदेव (Kokildev)
दूल्हराय के पुत्र कोकिलदेव ने 1207 ई. में मीणाओं से आमेर (Amer) छीन लिया और उसे अपनी राजधानी बनाया।
- महत्व: यह आमेर अगले 500 वर्षों (1727 ई. तक) तक कछवाहों की राजधानी बना रहा।
3. पृथ्वीराज कछवाहा और ’12 कोटड़ी’ व्यवस्था
16वीं सदी की शुरुआत में पृथ्वीराज कछवाहा (1503-1527) शासक बने। वे एक धार्मिक और वीर राजा थे।
- खानवा में भूमिका: 1527 के ऐतिहासिक खानवा युद्ध में उन्होंने राणा सांगा का साथ दिया और वीरगति को प्राप्त हुए।
- 12 कोटड़ी (12 Kotdi): पृथ्वीराज ने अपने 12 पुत्रों के लिए आमेर राज्य को 12 भागों में बांट दिया, जिसे इतिहास में ‘बारह कोटड़ी’ व्यवस्था कहा जाता है। इससे जागीरदारी प्रथा मजबूत हुई।
अध्याय 2: मुगलों से संबंध: एक नया कूटनीतिक युग (Mughal Relations: Bharmal)
1547 ई. में राजा भारमल (Bharmal) आमेर की गद्दी पर बैठे। उस समय आमेर की स्थिति गृहयुद्ध और बाहरी आक्रमणों के कारण बहुत नाजुक थी। भारमल ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने राजपूताने का इतिहास बदल दिया।
अकबर से पहली मुलाकात और संधि (1562 ई.)
मजनू खां की मदद से भारमल की मुलाकात बादशाह अकबर से हुई। 1562 में जब अकबर अजमेर दरगाह जा रहे थे, तब सांगानेर में भारमल ने अकबर की अधीनता स्वीकार की।
- ऐतिहासिक तथ्य: भारमल राजपूताने के पहले शासक थे जिन्होंने मुगलों की अधीनता स्वीकार की और उनसे वैवाहिक संबंध स्थापित किए।
सांभर विवाह और राजनीतिक प्रभाव
भारमल ने अपनी पुत्री हरखा बाई (जिसे बाद में ‘मरियम-उज़-ज़मानी’ कहा गया) का विवाह अकबर से सांभर (Sambhar) में कर दिया।
- इसी विवाह से मुगलों के अगले बादशाह जहाँगीर (सलीम) का जन्म हुआ।
- अकबर ने भारमल को ‘अमीर-उल-उमरा’ और ‘राजा’ की उपाधि दी और 5000 का मनसब प्रदान किया।
Note: इस संधि के कारण आमेर मुगलों का सबसे विश्वसनीय सहयोगी बन गया और आमेर का तेजी से विकास हुआ।
राजस्थान के प्रमुख ऐतिहासिक चरणों को समझने के लिए राजस्थान का इतिहास हिंदी में पढ़ें।
अध्याय 3: अकबर का सेनापति: राजा मान सिंह प्रथम (Raja Man Singh I)
भारमल के पोते और भगवंत दास के पुत्र मान सिंह (Man Singh) का जन्म 1550 ई. में मोजमाबाद में हुआ था। मात्र 12 वर्ष की उम्र में वे अकबर की सेवा में चले गए थे। मुगल इतिहास में मान सिंह का कद किसी बादशाह से कम नहीं था।
1. हल्दीघाटी का युद्ध और मान सिंह
अकबर ने महाराणा प्रताप को समझाने के लिए जो शिष्टमंडल भेजे थे, उसमें दूसरे नंबर पर मान सिंह गए थे। जब बात नहीं बनी, तो 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में अकबर ने अपनी शाही सेना का प्रधान सेनापति मान सिंह को ही बनाया।
2. मान सिंह के प्रमुख सैन्य अभियान (Military Campaigns)
मान सिंह ने मुगलों के लिए लगभग 67 युद्ध लड़े।
- काबुल अभियान (1581-1585): उन्होंने अफगानी विद्रोहियों को कुचला। इसी दौरान वे वहां से ब्लू पॉटरी (Blue Pottery) की कला को जयपुर लाए।
- बिहार और उड़ीसा: उन्होंने बिहार में गिद्धौर के राजा पूरणमल को हराया और उड़ीसा को मुगल साम्राज्य में मिलाया।
- बंगाल विजय: बंगाल के राजा केदार को हराकर वे वहां से शीला देवी (Shila Devi) की मूर्ति लाए, जिसे उन्होंने आमेर के किले में स्थापित किया।
3. सांस्कृतिक योगदान और मनसब
- 7000 का मनसब: अकबर ने मान सिंह को 7000 का मनसब दिया, जो उस समय किसी भी हिन्दू राजा के लिए सर्वाधिक था।
- फर्ज़न्द: अकबर उन्हें प्यार से ‘फर्ज़न्द’ (बेटा) कहता था।
- निर्माण: उन्होंने वृंदावन में गोविंद देव जी का मंदिर और आमेर में जगत शिरोमणि मंदिर (अपने पुत्र जगत सिंह की याद में) बनवाया।
अध्याय 4: कूटनीति के जादूगर: मिर्ज़ा राजा जयसिंह (Mirza Raja Jai Singh)
मान सिंह के बाद, आमेर के इतिहास में जो सबसे प्रतिभाशाली नाम आता है, वह है जयसिंह प्रथम (1621-1667 ई.)।
तीन मुगल बादशाहों का काल
मिर्ज़ा राजा जयसिंह ने तीन मुगल बादशाहों के साथ काम किया: जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगज़ेब।
- मिर्ज़ा की उपाधि: 1637 में शाहजहाँ ने उन्हें कंधार अभियान पर भेजते समय ‘मिर्ज़ा राजा’ की उपाधि दी थी।
शिवाजी और पुरंदर की संधि (Treaty of Purandar – 1665)
यह जयसिंह की कूटनीति का सबसे बड़ा प्रमाण है। औरंगज़ेब मराठा शेर शिवाजी महाराज को हराने में असफल हो रहा था। उसने जयसिंह को दक्कन भेजा।
- जयसिंह ने शिवाजी को चारों तरफ से घेर लिया और उन्हें संधि के लिए मजबूर कर दिया।
- 11 जून 1665 को ऐतिहासिक पुरंदर की संधि हुई।
- शिवाजी को अपने 35 में से 23 किले मुगलों को देने पड़े।
- शिवाजी के पुत्र शम्भाजी को मुगल दरबार में 5000 का मनसब मिला।
साहित्य और कला
मिर्ज़ा राजा जयसिंह के दरबार में प्रसिद्ध कवि बिहारी रहते थे, जिन्होंने ‘बिहारी सतसई’ की रचना की। कहा जाता है कि राजा जयसिंह उन्हें हर एक दोहे (Couplet) के लिए एक सोने की अशर्फी देते थे।
अध्याय 5: आधुनिक जयपुर के निर्माता: सवाई जयसिंह द्वितीय (Sawai Jai Singh II)
1700 ई. में गद्दी पर बैठने वाले जयसिंह द्वितीय को इतिहास ‘सवाई जयसिंह’ के नाम से जानता है। औरंगज़ेब ने उनकी वाकपटुता देखकर कहा था कि “तुम तो अपने पूर्वज (मिर्ज़ा राजा) से भी सवा सेर हो,” और उन्हें ‘सवाई’ की उपाधि दी।
1. 7 मुगल बादशाहों का काल
सवाई जयसिंह ने मुगलों का पतन देखा। उन्होंने औरंगज़ेब से लेकर मुहम्मद शाह रंगीला तक 7 बादशाहों का शासनकाल देखा।
2. हुड़दा सम्मलेन और मराठा संघर्ष (Hurda Conference – 1734)
मराठों के बढ़ते आक्रमणों को रोकने के लिए सवाई जयसिंह ने भीलवाड़ा के हुड़दा में राजपूत राजाओं को इकट्ठा किया।
- उद्देश्य: मराठों के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बनाना।
- परिणाम: राजाओं के आपसी अविश्वास के कारण यह सम्मलेन कागजों तक ही सीमित रहा और असफल हो गया।
3. जयपुर शहर की स्थापना (Founding of Jaipur – 1727)
सवाई जयसिंह का सबसे बड़ा योगदान जयपुर (Pink City) का निर्माण है।
- स्थापना: 18 नवंबर 1727।
- वास्तुकार (Architect): बंगाल के विद्याधर भट्टाचार्य।
- विशेषता: यह भारत का पहला योजनाबद्ध (Planned) शहर है जो ‘ग्रिड सिस्टम’ (समकोण पर काटती सड़कें) पर बना है। इसे 9 चौकड़ियों का शहर भी कहते हैं।
4. विज्ञान और जंतर-मंतर (Astronomy)
जयसिंह एक महान खगोलशास्त्री भी थे। उन्होंने भारत में 5 वेधशालाएं (Observatories) बनवाईं:
- जयपुर (जंतर-मंतर): सबसे बड़ी वेधशाला (UNESCO World Heritage)।
- दिल्ली (सबसे पुरानी)।
- उज्जैन।
- वाराणसी।
- मथुरा।
उन्होंने ‘जीज मुहम्मदशाही’ नाम से नक्षत्रों की सारणी भी तैयार करवाई।
अध्याय 6: उत्तरवर्ती शासक और एकीकरण (Later Rulers & Integration)
सवाई जयसिंह की मृत्यु (1743) के बाद जयपुर में गृहयुद्ध शुरू हो गया।
ईश्वरी सिंह vs माधोसिंह (Kachhwaha Civil War)
सवाई जयसिंह ने मेवाड़ की राजकुमारी से विवाह करते समय शर्त मानी थी कि उसका पुत्र ही राजा बनेगा।
- बड़े बेटे ईश्वरी सिंह और मेवाड़ी राजकुमारी के बेटे माधोसिंह के बीच युद्ध हुए (राजमहल और बगरू का युद्ध)।
- अंततः मराठों के दबाव और भारी कर्ज से परेशान होकर ईश्वरी सिंह ने आत्महत्या कर ली। (राजपूताने का एकमात्र शासक जिसने आत्महत्या की)।
सवाई प्रताप सिंह और हवामहल (1778-1803)
प्रताप सिंह एक अच्छे शासक और कवि (उपनाम: ब्रजनिधि) थे।
- हवामहल (1799): उन्होंने भगवान कृष्ण के मुकुट के आकार में 5 मंज़िला हवामहल बनवाया ताकि रानियाँ शाही जुलूस देख सकें। (वास्तुकार: लाल चंद उस्ता)।
- गंधर्व बाईसी: उनके दरबार में 22 विद्वानों, 22 कवियों और 22 संगीतकारों की मंडली थी।
बदनाम शासक: जगत सिंह
महाराजा जगत सिंह को जयपुर का ‘बदनाम शासक’ कहा जाता है क्योंकि वे अपनी प्रेमिका ‘रसकपूर’ (एक नर्तकी) के प्रभाव में थे और शासन की उपेक्षा की। इन्हीं के समय ‘कृष्णा कुमारी विवाद’ हुआ था।
1857 की क्रांति: रामसिंह द्वितीय
1857 की क्रांति के समय जयपुर के राजा रामसिंह द्वितीय थे। उन्होंने अंग्रेजों का तन-मन-धन से साथ दिया, जिसके बदले अंग्रेजों ने उन्हें ‘सितार-ए-हिन्द’ की उपाधि दी।
- इन्होंने ही जयपुर को गेरुआ रंग (Pink Color) में रँगवाया था।
एकीकरण: मान सिंह द्वितीय (Integration – 1949)
आज़ादी के समय जयपुर के शासक मान सिंह द्वितीय (पोलो खिलाड़ी) थे।
- सरदार पटेल के प्रयासों से 30 मार्च 1949 (वृहत राजस्थान) को जयपुर का विलय राजस्थान में हुआ।
- जयपुर को राजस्थान की राजधानी बनाया गया (सत्यनारायण राव समिति की सिफारिश पर)।
- सवाई मान सिंह द्वितीय को राजस्थान का पहला राजप्रमुख बनाया गया।
“राजस्थान की प्राचीन सभ्यताओं का इतिहास और उनके प्रमुख पुरातात्विक स्रोतों की विस्तृत जानकारी।”
Amer-Jaipur History Timeline (1137 AD – 1949 AD
| वर्ष (Year) | शासक / घटना (Ruler/Event) | विवरण (Key Details) |
| 1137 ई. | दूल्हराय (Dulharai) | कछवाहा वंश की स्थापना। बड़गूजरों को हराकर ‘दौसा’ को राजधानी बनाया। |
| 1207 ई. | कोकिलदेव (Kokildev) | मीणाओं को हराकर आमेर (Amer) पर अधिकार किया और राजधानी बनाई। |
| 1527 ई. | पृथ्वीराज कछवाहा | खानवा के युद्ध में राणा सांगा की मदद की। ’12 कोटड़ी’ व्यवस्था लागू की। |
| 1547-1573 | राजा भारमल (Bharmal) | 1562 में अकबर से सांभर में संधि की। मुगलों की अधीनता स्वीकारने वाले पहले राजपूत शासक। |
| 1589-1614 | राजा मान सिंह प्रथम | हल्दीघाटी युद्ध (1576) के सेनापति। बंगाल, बिहार, काबुल जीते। 7000 का मनसब मिला। |
| 1621-1667 | मिर्ज़ा राजा जयसिंह | तीन बादशाहों (जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगज़ेब) का काल देखा। 1665 में शिवाजी के साथ पुरंदर की संधि की। |
| 1700-1743 | सवाई जयसिंह द्वितीय | कछवाहा वंश के सबसे विद्वान शासक। 7 मुगल बादशाहों का काल देखा। |
| 1727 ई. | जयपुर की स्थापना | 18 नवंबर 1727 को सवाई जयसिंह ने ‘जयपुर’ (गुलाबी नगरी) बसाया। वास्तुकार: विद्याधर भट्टाचार्य। |
| 1734 ई. | हुड़दा सम्मेलन | मराठों के खिलाफ राजपूतों को इकट्ठा करने का प्रयास किया, जो असफल रहा। |
| 1778-1803 | सवाई प्रताप सिंह | ब्रजनिधि नाम से कविताएं लिखते थे। 1799 में हवामहल का निर्माण करवाया। |
| 1818 ई. | जगत सिंह | ईस्ट इंडिया कंपनी (अंग्रेजों) के साथ संधि की। |
| 1835-1880 | रामसिंह द्वितीय | 1857 की क्रांति में अंग्रेजों का साथ दिया। जयपुर को गेरुआ (Pink) रंग में रंगवाया। |
| 1949 ई. | मान सिंह द्वितीय | 30 मार्च 1949 को जयपुर का राजस्थान में विलय हुआ। वे राजस्थान के पहले राजप्रमुख बने। |
निष्कर्ष (Conclusion)
आमेर-जयपुर का इतिहास हमें सिखाता है कि युद्ध केवल तलवारों से नहीं, बल्कि बुद्धि और कूटनीति से भी जीते जाते हैं। जहाँ मेवाड़ ने प्रतिरोध का रास्ता चुना, वहीं जयपुर ने सहयोग और कूटनीति का रास्ता चुना, जिसके कारण जयपुर कला, साहित्य और विज्ञान का केंद्र बन सका।
आज भी आमेर का किला, हवामहल और जंतर-मंतर कछवाहा वंश की उस महान विरासत की गवाही देते हैं।
(FAQ) – Jaipur History
Q1: आमेर के कछवाहा वंश का आदि पुरुष (Founder) कौन था?
Ans: कछवाहा वंश की स्थापना दूल्हराय (तेजकरण) ने 1137 ई. के आसपास की थी, लेकिन आमेर को राजधानी 1207 में कोकिलदेव ने बनाया।
Q2: किस राजपूत राजा ने सबसे पहले मुगलों से संधि की थी?
Ans: आमेर के राजा भारमल ने 1562 ई. में सबसे पहले अकबर की अधीनता स्वीकार की थी।
Q3: ‘पुरंदर की संधि’ (1665) किसके बीच हुई थी?
Ans: यह संधि मुगल सेनापति मिर्ज़ा राजा जयसिंह और मराठा छत्रपति शिवाजी महाराज के बीच हुई थी।
Q4: जयपुर शहर की स्थापना कब और किसने की?
Ans: सवाई जयसिंह द्वितीय ने 18 नवंबर 1727 को जयपुर बसाया। इसके वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य थे।
Q5: हवामहल का निर्माण किसने करवाया था?
Ans: सवाई प्रताप सिंह ने 1799 ई. में हवामहल बनवाया था।



