Introduction
राजस्थान न केवल वीरों की भूमि है, बल्कि यह मानव सभ्यता के विकास का गवाह भी रहा है। पाषाण काल से लेकर मौर्य काल तक, यहाँ कई सभ्यताओं ने जन्म लिया। इस गाइड में हम राजस्थान के ऐतिहासिक स्रोतों (शिलालेख और सिक्के) और कालीबंगा, आहड़, गणेश्वर व बैराठ जैसी प्रमुख सभ्यताओं के बारे में विस्तार से जानेंगे।
भौगोलिक स्थिति और सभ्यताओं का विकास
दुनिया की हर बड़ी सभ्यता का विकास किसी न किसी नदी के किनारे हुआ है, और राजस्थान इसका अपवाद नहीं है। राजस्थान की भौगोलिक स्थिति ने इन सभ्यताओं के स्वरुप को निर्धारित किया। इसे हम मुख्य रूप से तीन भागों में समझ सकते हैं:
- सरस्वती-दृषद्वती घाटी (उत्तरी राजस्थान): प्राचीन काल में बहने वाली सरस्वती (वर्तमान घग्घर) नदी के किनारे कालीबंगा और पीलीबंगा जैसी सभ्यताओं का विकास हुआ। यह क्षेत्र उपजाऊ था और हड़प्पा संस्कृति के व्यापारिक मार्ग पर स्थित था।
- बनास और उसकी सहायक नदियाँ (दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान): उदयपुर और चित्तौड़गढ़ के आसपास बनास, बेड़च और कोठारी नदियों के किनारे आहड़ और गिलूण्ड जैसी सभ्यताओं ने जन्म लिया। यहाँ प्रचुर मात्रा में पत्थर और तांबा उपलब्ध था, जिसने यहाँ के लोगों को आत्मनिर्भर बनाया।
- कांतली नदी क्षेत्र (शेखावाटी): सीकर के पास कांतली नदी के प्रवाह क्षेत्र में गणेश्वर सभ्यता पनपी। खेतड़ी (झुंझुनूं) की तांबे की खदानों के पास होने के कारण, यह क्षेत्र भारत में तांबे के उपकरणों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता (Supplier) बन गया।
राजस्थान के इतिहास का कालक्रम (Timeline of Ancient Rajasthan)
राजस्थान में सभ्यताओं के विकास को हम निम्नलिखित चरणों (Phases) में बांट सकते हैं:
- पाषाण काल (Stone Age): मानव ने पत्थरों के औजारों का उपयोग शुरू किया। भीलवाड़ा का बागोर (Bagor) और बाड़मेर का तिलवाड़ा मध्यपाषाण काल के सबसे बड़े उदाहरण हैं, जहाँ से पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं।
- कांस्य युग / सिंधु घाटी सभ्यता (Bronze Age – 2350 ई.पू. से 1750 ई.पू.): इस काल में कालीबंगा एक व्यवस्थित नगर के रूप में उभरा। यहाँ का नगर नियोजन (Town Planning) और जल निकासी व्यवस्था अद्भुत थी।
- ताम्र-पाषाण युग (Copper Age): यह वह दौर था जब मनुष्य तांबे और पत्थर दोनों का उपयोग करता था। गणेश्वर (2800 ई.पू.) और आहड़ (1900 ई.पू.) इस काल की प्रमुख बस्तियां हैं। गणेश्वर को ‘ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी’ भी कहा जाता है।
- लौह युग और महाजनपद काल (Iron Age – 1500 ई.पू. के बाद): लोहे की खोज ने कृषि और युद्ध की तकनीकों को बदल दिया। बैराठ (विराटनगर), सुनारी (झुंझुनूं) और रेड (टोंक) इस काल के प्रमुख केंद्र बने। इसी समय राजस्थान में मत्स्य, शूरसेन और शिवि जैसे जनपदों का उदय हुआ।
1. राजस्थान के इतिहास के स्रोत: शिलालेख और सिक्के
इतिहास को समझने के लिए साक्ष्य सबसे जरूरी हैं। राजस्थान में मिले विभिन्न शिलालेख (Inscriptions) और सिक्के (Coins) हमें उस समय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति बताते हैं। चाहे वह घटियाला का शिलालेख हो या गुप्तकालीन सिक्के, ये सब हमारे अतीत के दर्पण हैं।
शिलालेख: चाहे वह अशोक का भाब्रू शिलालेख हो या बिजोलिया का शिलालेख (जो चौहानों की वंशावली बताता है), ये हमें राजाओं की उपलब्धियों और उस समय के समाज की सटीक जानकारी देते हैं। ‘राजप्रशस्ति’ जैसे महाकाव्य पत्थरों पर ही उकेरे गए थे।
सिक्के: प्राचीन ‘आहत सिक्के’ (Punch Marked Coins) से लेकर गुप्तकालीन सोने के सिक्कों तक, राजस्थान में मुद्रा का एक समृद्ध इतिहास रहा है। रेड (टोंक) को तो ‘प्राचीन भारत का टाटानगर’ कहा जाता है क्योंकि वहाँ सिक्कों का विशाल भंडार मिला था।
यहाँ पढ़ें: राजस्थान के प्रमुख शिलालेखों और सिक्कों
2. सिंधु घाटी सभ्यता
सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) विश्व की सबसे प्राचीन और व्यवस्थित सभ्यताओं में से एक है। इसकी नगर नियोजन (Town Planning), जल निकासी प्रणाली और व्यापारिक संबंध इसे अद्वितीय बनाते हैं। राजस्थान भी इस विशाल सभ्यता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
ज्यादा जाने – “सिंधु घाटी सभ्यता: इतिहास और नगर नियोजन”
3. राजस्थान की प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ
राजस्थान में नदियों के किनारे कई सभ्यताओं का विकास हुआ। आइये प्रमुख स्थलों पर एक नज़र डालें:
क. कालीबंगा सभ्यता (Kalibangan Civilization) – जिला: हनुमानगढ़ | नदी: घग्घर (प्राचीन सरस्वती)
सिंधु घाटी सभ्यता की बात हो और कालीबंगा का नाम न आए, यह असंभव है। सिन्धी भाषा में कालीबंगा का अर्थ है— “काली चूड़ियां”। यह एक नगरीय सभ्यता थी जो दो टीलों पर बसी थी—एक दुर्ग क्षेत्र और दूसरा नगर क्षेत्र। यहाँ हुई खुदाई में विश्व के सबसे प्राचीन ‘जुते हुए खेत’ (Ploughed Field) के साक्ष्य मिले हैं। इसके अलावा, यहाँ से एक साथ दो फसलें उगाने, लकड़ी की नाली, और सात अग्निकुंड (Fire Altars) के प्रमाण मिले हैं जो इसके धार्मिक महत्व को दर्शाते हैं। यहाँ के मकानों में कच्ची ईंटों का प्रयोग होता था, इसलिए इसे ‘दीन-हीन बस्ती’ भी कहा गया।
ज्यादा जाने –“कालीबंगा सभ्यता”
ख. गणेश्वर सभ्यता (Ganeshwar Civilization) – जिला: नीम का थाना (पूर्व में सीकर) | नदी: कांतली
गणेश्वर को पुरातत्व का पुष्कर भी कहा जाता है। यह भारत की सबसे प्राचीन ताम्रयुगीन बस्तियों में से एक है, जिसका समय काल लगभग 2800 ई.पू. माना जाता है। यहाँ खुदाई में जो तांबे के उपकरण (कुल्हाड़ी, तीर, भाले, मछली पकड़ने के कांटे) मिले हैं, उनमें 99% शुद्ध तांबा है। सबसे रोचक बात यह है कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को तांबे की आपूर्ति (Supply) यहीं से की जाती थी। यहाँ के लोग शिकार पर निर्भर थे और बाढ़ से बचने के लिए उन्होंने पत्थर के बांध (Stone Dams) बनाए थे, जो उस समय की इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना है।
जानें यहाँ: “गणेश्वर सभ्यता”
ग. आहड़ सभ्यता (Ahar Civilization) – जिला: उदयपुर | नदी: बेड़च (बनास)
जहाँ कालीबंगा एक नगरीय सभ्यता थी, वहीं आहड़ एक ग्रामीण संस्कृति थी। इसे स्थानीय लोग ‘धूलकोट’ (रेत का टीला) कहते हैं। प्राचीन दस्तावेजों में इसे ‘आघाटपुर’ या ‘ताम्रवती नगरी’ भी कहा गया है। आहड़ के लोग संयुक्त परिवार (Joint Family) में विश्वास रखते थे, जिसका सबूत यहाँ एक ही घर में मिले 6 चूल्हे हैं। यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता ‘काले और लाल मृदभांड’ (Black & Red Ware) हैं, जिन्हें उल्टी तपाई विधि से पकाया जाता था। यहाँ तांबा गलाने की भट्टियां भी मिली हैं, जो बताती हैं कि यह एक औद्योगिक केंद्र था।
जानें यहाँ: “आहड़ सभ्यता”
घ. बैराठ सभ्यता (Bairath Civilization) – जिला: कोटपूतली-बहरोड़ (पूर्व में जयपुर) | नदी: बाणगंगा (अर्जुन की गंगा)
बैराठ (प्राचीन विराटनगर) का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है, जहाँ पांडवों ने अपना अज्ञातवास बिताया था। लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से यह मौर्य काल और बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ ‘बीजक की पहाड़ी’ से सम्राट अशोक का भाब्रू शिलालेख खोजा गया, जिसमें अशोक ने बुद्ध, धम्म और संघ में आस्था प्रकट की थी। यहाँ एक प्राचीन गोल बौद्ध मंदिर (Circular Temple) और स्तूप के अवशेष भी मिले हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपनी यात्रा वृतांत में इस स्थान का वर्णन किया है।
जानें यहाँ: “बैराठ सभ्यता: मौर्य और बौद्ध कालीन इतिहास”
निष्कर्ष:
राजस्थान की ऐतिहासिक यात्रा अद्भुत है। यहाँ की मरुभूमि में केवल रेत ही नहीं, बल्कि हजारों साल पुरानी सभ्यताओं के रहस्य भी दबे हुए हैं। कालीबंगा की व्यवस्थित नगर योजना से लेकर बैराठ की बौद्ध संस्कृति तक, और गणेश्वर के तांबे के उपकरणों से लेकर आहड़ की ग्रामीण संस्कृति तक—हर स्थल की अपनी एक अलग कहानी है।
ये पुरातात्विक स्थल और ऐतिहासिक स्रोत (शिलालेख व सिक्के) न केवल हमें हमारे पूर्वजों की जीवनशैली से परिचित कराते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि राजस्थान प्राचीन काल से ही व्यापार, कला और संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र रहा है।
FAQ
Q1. राजस्थान की सबसे प्राचीन सभ्यता कौन सी मानी जाती है?
सिंधु घाटी सभ्यता के संदर्भ में कालीबंगा (Kalibangan) राजस्थान की सबसे प्राचीन और प्रमुख सभ्यता मानी जाती है (2350 ई.पू.)। हालाँकि, यदि हम पाषाण काल की बात करें, तो भीलवाड़ा का बागोर (Bagor) मध्यपाषाण काल का सबसे पुराना स्थल है, जहाँ से पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं।
Q2. ‘ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी’ किसे कहा जाता है?
सीकर (नीम का थाना) स्थित गणेश्वर सभ्यता (Ganeshwar Civilization) को ‘ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी’ कहा जाता है। यह भारत की सबसे पुरानी ताम्रयुगीन बस्तियों में से एक है और यहाँ से हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को तांबा निर्यात किया जाता था।
Q3. कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ क्या है और यह किस जिले में है?
कालीबंगा सिन्धी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है— “काली चूड़ियां” (Black Bangles)। यह सभ्यता राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्घर (प्राचीन सरस्वती) नदी के किनारे स्थित है।
Q4. अशोक का भाब्रू शिलालेख कहाँ से प्राप्त हुआ था?
सम्राट अशोक का भाब्रू शिलालेख बैराठ (विराटनगर) की ‘बीजक की पहाड़ी’ से प्राप्त हुआ था। इस शिलालेख की खोज 1837 में कैप्टन बर्ट ने की थी। यह अशोक के बौद्ध धर्म में विश्वास का सबसे बड़ा प्रमाण है।
Q5. आहड़ सभ्यता और कालीबंगा सभ्यता में मुख्य अंतर क्या है?
सबसे बड़ा अंतर यह है कि कालीबंगा एक नगरीय सभ्यता (Urban Civilization) थी जहाँ पक्की नालियाँ और व्यवस्थित सड़कें थीं, जबकि आहड़ एक ग्रामीण संस्कृति (Rural Civilization) थी जो कृषि और पशुपालन पर आधारित थी। कालीबंगा में ईंटों का प्रयोग ज्यादा हुआ, जबकि आहड़ में पत्थरों का।




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