महाराणा राज सिंह की मृत्यु (1680) के बाद मेवाड़ की तलवार की धार थोड़ी कुंद पड़ गई थी। औरंगज़ेब के कमजोर होने के साथ ही भारत में एक नई शक्ति का उदय हुआ—मराठा (Marathas)।
अगले 200 सालों में मेवाड़ ने बहुत उतार-चढ़ाव देखे। कभी मराठों की लूटमार, कभी जयपुर-जोधपुर के साथ ‘कृष्णा कुमारी’ को लेकर युद्ध, और अंत में अंग्रेजों की गुलामी।
1. देबारी समझौता और हुरड़ा सम्मेलन (Debari Pact And Hurda Conference)
महाराणा राज सिंह के बाद जयसिंह और फिर अमर सिंह-II शासक बने।
- देबारी समझौता (1708 ई.):मेवाड़ (अमर सिंह-II), मारवाड़ (अजीत सिंह) और जयपुर (सवाई जयसिंह) ने मिलकर मुगलों के खिलाफ एक गठबंधन बनाया।
- शर्त: मेवाड़ की राजकुमारी ‘चंद्रकंवर’ का विवाह जयपुर के सवाई जयसिंह से होगा और उसका पुत्र ही जयपुर का राजा बनेगा। (यही शर्त आगे जाकर जयपुर में गृहयुद्ध का कारण बनी)।
- हुरड़ा सम्मेलन (Hurda Conference – 17 July 1734):मराठों के बढ़ते हस्तक्षेप को रोकने के लिए मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह-II की अध्यक्षता में भीलवाड़ा के हुरड़ा (Hurda) नामक स्थान पर सभी राजपूत राजा इकट्ठा हुए।
- उद्देश्य: मराठों के खिलाफ एकजुट होना।
- परिणाम: यह सम्मेलन असफल (Failed) रहा क्योंकि राजाओं के आपसी अहंकार (Ego) आड़े आ गए।
2. कृष्णा कुमारी विवाद: मेवाड़ के इतिहास का काला अध्याय (Krishna Kumari Dispute – 1807)
यह घटना दिखाती है कि उस समय राजपूत राजा कितने कमजोर हो चुके थे।
- पात्र (Characters):
- कृष्णा कुमारी: मेवाड़ के महाराणा भीम सिंह की बेटी।
- भीम सिंह: जोधपुर (मारवाड़) के राजा।
- जगत सिंह: जयपुर के राजा।
- कहानी: कृष्णा कुमारी की सगाई जोधपुर के भीम सिंह से तय हुई, लेकिन शादी से पहले उनकी मृत्यु हो गई। मेवाड़ वालों ने रिश्ता जयपुर (जगत सिंह) तय कर दिया। इस पर जोधपुर के नए राजा मान सिंह ने इसे अपमान माना और कहा— “नारियल (शगुन) जोधपुर आया था, तो डोली भी जोधपुर ही जाएगी।”
- गांगोली का युद्ध (1807): जयपुर और जोधपुर के बीच युद्ध हुआ।
- दुखद अंत: अमीर खां पिंडारी और अजीत सिंह चुंडावत के दबाव में आकर, युद्ध रोकने के लिए 16 वर्ष की कृष्णा कुमारी को जहर (Poison) दे दिया गया।यह घटना मेवाड़ के गौरवमयी इतिहास पर एक गहरा धब्बा मानी जाती है।
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3. ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि (Treaty with British – 1818)
मराठों और पिंडारियों की लूटमार से परेशान होकर और सामंतों के विद्रोह से तंग आकर मेवाड़ ने अंग्रेजों की शरण ली।
- शासक: महाराणा भीम सिंह।
- तारीख: 13 जनवरी 1818 (Metcalfe ने संधि करवाई)।
- शर्तें: अंग्रेजों ने मेवाड़ की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली, बदले में मेवाड़ ने अंग्रेजों को ‘खिराज’ (Tax) देना स्वीकार किया।
- कर्नल जेम्स टॉड: संधि के बाद टॉड मेवाड़ के पहले Political Agent बनकर उदयपुर आए। उन्होंने ही मेवाड़ का इतिहास व्यवस्थित रूप से लिखा।
4. 1857 की क्रांति और स्वरूप सिंह (Revolution of 1857)
1857 की क्रांति के समय मेवाड़ के शासक महाराणा स्वरूप सिंह (Swaroop Singh) थे।
- इन्होंने विद्रोहियों का साथ न देकर अंग्रेजों का साथ दिया।
- नीमच छावनी से भागे हुए 40 अंग्रेज परिवारों को उदयपुर के जग मंदिर महलों में शरण दी और उनकी जान बचाई।
- Fact: स्वरूप सिंह के समय ही मेवाड़ में डाकन प्रथा (Witch Hunting) और सती प्रथा पर रोक लगाई गई थी।
5. फतेह सिंह और ‘चेतावणी रा चूंगट्या’ (Fateh Singh)
महाराणा फतेह सिंह एक स्वाभिमानी शासक थे।
- दिल्ली दरबार (1903): लॉर्ड कर्जन ने दिल्ली दरबार आयोजित किया। फतेह सिंह उसमें शामिल होने जा रहे थे।
- केसरी सिंह बारहठ: महान क्रांतिकारी केसरी सिंह बारहठ ने उन्हें 13 सोरठे (दोहे) लिखकर भेजे, जिन्हें ‘चेतावणी रा चूंगट्या’ कहा जाता है।
- इन्हें पढ़कर फतेह सिंह का सोता हुआ स्वाभिमान जाग गया और वे दिल्ली पहुँचकर भी दरबार में शामिल नहीं हुए और वापस आ गए।
6. एकीकरण: आधुनिक राजस्थान का निर्माण (Integration of Mewar – 1948)
आज़ादी (1947) के समय मेवाड़ के शासक महाराणा भूपाल सिंह (Bhupal Singh) थे। वे अपाहिज (Paralyzed) थे, लेकिन इरादों के पक्के थे।
जब पाकिस्तान और जिन्ना ने उन्हें लालच दिया, तो भूपाल सिंह ने ऐतिहासिक जवाब दिया:
“मेवाड़ का निर्णय तो मेरे पूर्वज बहुत पहले (हल्दीघाटी में) कर चुके हैं। मैं तो बस उस पर कायम हूँ।”
- विलय (Merger): राजस्थान एकीकरण के तीसरे चरण (18 अप्रैल 1948) में मेवाड़ का विलय हुआ और ‘संयुक्त राजस्थान’ (United Rajasthan) बना।
- पद: महाराणा भूपाल सिंह राजस्थान के एकमात्र ‘महाराजप्रमुख’ (Maharajpramukh) बने।
Quick Recap Timeline (1700-1948)
| शासक/घटना | विवरण (Details) |
| हुरड़ा सम्मेलन (1734) | मराठों के विरुद्ध (जगत सिंह-II)। |
| कृष्णा कुमारी विवाद | महाराणा भीम सिंह के समय (जहर दिया गया)। |
| अंग्रेजों से संधि (1818) | महाराणा भीम सिंह ने की। |
| 1857 की क्रांति | महाराणा स्वरूप सिंह (अंग्रेजों की मदद की)। |
| चेतावणी रा चूंगट्या | महाराणा फतेह सिंह को रोका (केसरी सिंह बारहठ)। |
| एकीकरण (1948) | महाराणा भूपाल सिंह (महाराजप्रमुख बने)। |
“अगर आप राजस्थान का पूरा इतिहास पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी [Rajasthan History Guide] पढ़ें।”
Conclusion
566 ई. में गुहादित्य द्वारा एक गुफा से शुरू हुआ ‘गुहिल वंश’ 1948 में भारत के लोकतंत्र में विलीन हो गया।
तकरीबन 1400 सालों तक एक ही वंश ने एक ही क्षेत्र पर शासन किया—यह दुनिया के इतिहास में दुर्लभ है। बप्पा रावल की तलवार, कुंभा का स्थापत्य, सांगा का शौर्य, पन्ना का त्याग और प्रताप का स्वाभिमान—यही मेवाड़ है।
“राजस्थान के अन्य प्राचीन स्थलों और ऐतिहासिक स्रोतों की पूरी जानकारी के लिए हमारी [मुख्य गाइड: राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ] पढ़ें।”




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