"A modern artistic painting depicting historical scenes of Maharana Sanga, the Battle of Khanwa and the sacrifice of Panna Dhai."

महाराणा सांगा, खानवा का युद्ध और उदय सिंह |Maharana Sanga, Battle of Khanwa and Udai Singh

Introduction

मेवाड़ के इतिहास (History of Mewar) में महाराणा कुंभा के बाद अगर कोई ऐसा शासक हुआ जिसने दिल्ली की सल्तनत को अपनी उंगलियों पर नचाया, तो वे थे महाराणा सांगा (Maharana Sanga)

इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने उन्हें ‘सिपाही का अंश’ (Soldier’s Wreck) कहा है। कल्पना कीजिये एक ऐसे राजा की जिसकी एक आँख नहीं थी, एक हाथ नहीं था, एक पैर से लंगड़ाते थे और शरीर पर तलवार-भालों के 80 घाव थे—फिर भी जब वे युद्ध के मैदान (Battlefield) में उतरते थे, तो बाबर जैसे आक्रमणकारी भी कांप उठते थे1. 1!।

1. महाराणा सांगा ( Maharana Sanga )

महाराणा सांगा का असली नाम संग्राम सिंह (Sangram Singh I) था। इनका जन्म 1482 ई. में हुआ। गद्दी तक का सफर आसान नहीं था क्योंकि उन्हें अपने ही भाइयों—पृथ्वीराज (उड़ना राजकुमार) और जयमल—से जानलेवा संघर्ष करना पड़ा।

  • अज्ञातवास (Exile): भाइयों के डर से सांगा को घर छोड़ना पड़ा। उन्होंने अजमेर के करमचंद पंवार के यहाँ शरण ली।
  • राज्याभिषेक (1509 ई.): अपने भाइयों की मृत्यु के बाद, 1509 ई. में सांगा मेवाड़ के महाराणा बने।
  • उपाधि (Title): सांगा अंतिम भारतीय शासक थे जिनके नेतृत्व में सभी राजपूत राजा एक झंडे के नीचे आए। इसलिए उन्हें ‘हिन्दूपत’ (Hindupat) कहा जाता है।

2. दिल्ली और मालवा विजय (Major Battles of Maharana Sanga)

खानवा के युद्ध से पहले सांगा ने दिल्ली और मालवा के सुल्तानों को धूल चटा दी थी। ये युद्ध एग्जाम (Exam) के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं:

A. खातौली का युद्ध (Battle of Khatoli – 1517 ई.)

  • स्थान: कोटा (वर्तमान में)।
  • किसके बीच: सांगा vs इब्राहिम लोदी (दिल्ली सुल्तान)।
  • परिणाम: सांगा की शानदार जीत हुई। लोदी अपनी जान बचाकर भागा। इसी युद्ध में सांगा ने अपना एक हाथ और एक पैर (तीर लगने से) खो दिया था।

B. बाड़ी का युद्ध (Battle of Bari – 1518 ई.)

  • स्थान: धौलपुर।
  • कहानी: अपनी हार का बदला लेने के लिए इब्राहिम लोदी ने मियां माखन के नेतृत्व में सेना भेजी, लेकिन सांगा ने उन्हें फिर से बुरी तरह हराया। इससे उत्तर भारत में सांगा का दबदबा (Dominance) स्थापित हो गया।

C. गागरोन का युद्ध (Battle of Gagron – 1519 ई.)

  • स्थान: झालावाड़।
  • किसके बीच: सांगा vs महमूद खिलजी II (मालवा)।
  • परिणाम: सांगा ने महमूद खिलजी को हराकर बंदी बना लिया, लेकिन अपनी उदारता (Generosity) दिखाते हुए उसे राज्य वापस लौटा दिया।

3. बयाना का युद्ध (Battle of Bayana – Feb 1527)

बाबर भारत आ चुका था और पानीपत के पहले युद्ध (1526) में इब्राहिम लोदी को हरा चुका था। अब भारत में दो शेर थे—बाबर और सांगा।

16 फरवरी 1527 को भरतपुर के बयाना (Bayana) में मुगलों और राजपूतों की पहली भिड़ंत हुई।

  • नतीजा: सांगा की सेना ने बाबर की सेना को गाजर-मूली की तरह काट दिया। मुगल सेना में सांगा का इतना खौफ बैठ गया कि उन्होंने सांगा के खिलाफ लड़ने से मना कर दिया।
  • बाबर की चाल: अपने डरे हुए सैनिकों में जोश भरने के लिए बाबर ने ‘जिहाद’ (Jihad) का नारा दिया और शराब न पीने की कसम खाई।

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4. खानवा का युद्ध: भारत के भाग्य का फैसला (Battle of Khanwa – 17 March 1527)

यह युद्ध भारत के इतिहास का सबसे निर्णायक युद्ध (Decisive Battle) माना जाता है।

  • पाती पेरवन (Pati Pervan): राजपूताना के इतिहास में यह आखिरी बार था जब सांगा ने ‘पाती पेरवन’ परंपरा के तहत सभी राजाओं को चिट्ठी लिखकर युद्ध के लिए बुलाया।
    • कौन-कौन आया: आमेर से पृथ्वीराज, मारवाड़ से मालदेव, बीकानेर से कल्याणमल, और मेवात से हसन खां मेवाती।
  • युद्ध का आँखों देखा हाल: रूपवास (भरतपुर) के मैदान में युद्ध शुरू हुआ। राजपूत वीरता से लड़े, लेकिन बाबर के पास दो चीजें थीं जो सांगा के पास नहीं थीं:
    1. तोपखाना (Artillery): बाबर की तोपों (मुस्तफा और उस्ताद अली) ने आग बरसानी शुरू की।
    2. तुलुगमा पद्धति (Tulughama Strategy): बाबर ने सेना को पीछे से घेरने की नीति अपनाई।
  • The Turning Point: युद्ध के बीच में सांगा के सिर पर तीर लगा और वे बेहोश हो गए। उन्हें मैदान से बाहर ले जाया गया और झाला अज्जा (Jhala Ajja) ने सांगा का मुकुट पहनकर युद्ध जारी रखा।
  • विश्वासघात: रायसीन के सहलदी तंवर (Silhadi Twar) ने सांगा के साथ धोखा किया और बाबर से जा मिला। अंततः बाबर की जीत हुई।

5. महाराणा सांगा की मृत्यु (Death of Sanga)

होश में आने के बाद जब सांगा को पता चला कि वे हार गए हैं, तो उन्होंने कसम खाई— “मैं चित्तौड़ में तब तक कदम नहीं रखूँगा जब तक बाबर को हरा न दूँ।”

लेकिन उनके सामंत (Nobles) अब और युद्ध नहीं चाहते थे।

  • विष (Poison): कहा जाता है कि कालपी (Kalpi) नामक स्थान पर उनके साथियों ने ही उन्हें जहर दे दिया।
  • मृत्यु: 30 जनवरी 1528 को बसवा (दौसा) में उनकी मृत्यु हुई।
  • छतरी: मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) में महाराणा सांगा की 32 खंभों की छतरी बनी हुई है।

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Quick Exam Fact Box

तथ्य (Fact)विवरण (Detail)
उपाधिहिन्दूपत (Hindupat), सिपाही का अंश
शरीर के घाव80 घाव (कर्नल टॉड के अनुसार)
सांगा के सेनापतिहसन खां मेवाती (मेवात), महमूद लोदी
खानवा का महत्वइसके बाद भारत में मुगल साम्राज्य की जड़ें पक्की हो गईं।

Panna Dhai And Udai Singh

महाराणा सांगा की मृत्यु (1528) के बाद मेवाड़ के इतिहास में एक काला अध्याय (Dark Phase) शुरू हुआ। आपसी कलह और कमजोर शासकों के कारण मेवाड़ की सुरक्षा दीवारें हिलने लगी थीं।

इस कालखंड (1528-1572) में मेवाड़ ने बहुत कुछ देखा—रानी कर्मावती का जौहर, इतिहास का सबसे महान बलिदान (Panna Dhai Sacrifice), और उदयपुर की स्थापना। साथ ही, चित्तौड़ ने अपने इतिहास का दूसरा और तीसरा साका भी इसी दौरान देखा।

1. विक्रमादित्य और चित्तौड़ का दूसरा साका (The Second Saka – 1534-35 AD)

सांगा के बाद रतन सिंह-II राजा बने, लेकिन उनकी जल्द मृत्यु हो गई। इसके बाद सांगा के छोटे पुत्र विक्रमादित्य गद्दी पर बैठे। वे अयोग्य और हठी शासक थे, जिससे मेवाड़ के सामंत नाराज थे।

इस कमजोरी का फायदा उठाकर गुजरात के शासक बहादुर शाह (Bahadur Shah) ने चित्तौड़ पर हमला कर दिया।

  • रानी कर्मावती की कूटनीति (Rakhi to Humayun): सांगा की विधवा पत्नी, रानी कर्मावती ने हुमायूँ (Humayun) को राखी भेजकर मदद मांगी। हुमायूँ मदद के लिए निकला भी, लेकिन समय पर नहीं पहुँच सका। (इतिहासकार इस पर अलग-अलग राय रखते हैं, लेकिन यह घटना बहुत प्रसिद्ध है)।
  • देवलिया के रावत बाघ सिंह का नेतृत्व: जब मदद नहीं मिली, तो रानी कर्मावती ने जौहर (Jauhar) करने का निर्णय लिया। सेना का नेतृत्व देवलिया (प्रतापगढ़) के रावत बाघ सिंह ने किया।
    • परिणाम: 1534-35 ई. में चित्तौड़ का दूसरा साका हुआ। रानी कर्मावती ने हजारों वीरांगनाओं के साथ अग्नि स्नान किया और बाघ सिंह पाडल पोल पर लड़ते हुए शहीद हुए।

2. पन्ना धाय का बलिदान (The Sacrifice of Panna Dhai – 1536 AD)

बहादुर शाह तो चला गया, लेकिन मेवाड़ पर घर के ही दुश्मन की नज़र थी। पृथ्वीराज (उड़ना राजकुमार) का दासी पुत्र बनवीर (Banvir) सत्ता हथियाना चाहता था।

  • विक्रमादित्य की हत्या: बनवीर ने एक रात विक्रमादित्य की हत्या कर दी।
  • उदय सिंह पर खतरा: अब उसकी नज़र छोटे राजकुमार उदय सिंह (Udai Singh) पर थी, जो मेवाड़ के भविष्य थे।

वह काली रात: बनवीर नंगी तलवार लेकर उदय सिंह के कक्ष की ओर बढ़ा। उदय सिंह की धाय माँ, पन्ना धाय (Panna Dhai) (गुर्जर जाति की) को इसकी भनक लग गई।

  • बलिदान: पन्ना धाय ने तुरंत उदय सिंह को एक टोकरी में छिपाकर बारी (कीरत बारी) के साथ बाहर भेज दिया। और उदय सिंह के बिस्तर पर अपने सगे बेटे चंदन (Chandan) को सुला दिया।
  • हत्या: बनवीर आया और उसने चंदन को उदय सिंह समझकर मार डाला। पन्ना धाय ने अपनी आँखों के सामने अपने जिगर के टुकड़े को कटते देखा, लेकिन ‘उफ़’ तक नहीं की।

यह त्याग दुनिया के इतिहास में कहीं और नहीं मिलता। अगर पन्ना धाय न होतीं, तो आज मेवाड़ का इतिहास कुछ और होता।

3. महाराणा उदय सिंह: उदयपुर की स्थापना ( Maharana Udai SinghFounding of Udaipur – 1559 AD)

पन्ना धाय उदय सिंह को लेकर कुम्भलगढ़ पहुँची, जहाँ किलेदार आशा देवपुरा ने उन्हें शरण दी। 1540 ई. में मावली के युद्ध (Battle of Mavli) में उदय सिंह ने बनवीर को हराया और पुनः चित्तौड़ प्राप्त किया।

  • उदयपुर की स्थापना (1559): उदय सिंह दूरदर्शी थे। वे जानते थे कि चित्तौड़ सुरक्षित नहीं है क्योंकि वह मैदानी इलाके में है। इसलिए, उन्होंने गिरवा की पहाड़ियों (सुरक्षित स्थान) में एक नया शहर बसाया—उदयपुर (Udaipur)
    • आखा तीज (Akshaya Tritiya): 1559 ई. में उदयपुर की नींव रखी गई।
    • उदय सागर झील: इसी समय आयड़ नदी के पानी को रोककर उदय सागर झील बनाई गई।

4. चित्तौड़ का तीसरा साका और अकबर का आक्रमण (The Third Saka – 1567-68 AD)

मुगल बादशाह अकबर (Akbar) पूरे भारत को जीतना चाहता था। 1567 ई. में उसने चित्तौड़ को घेर लिया।

  • उदय सिंह का निर्णय: मेवाड़ के सामंतों की सलाह पर उदय सिंह किले की जिम्मेदारी अपने सेनापतियों को सौंपकर गोगुन्दा (पहाड़ियों) में चले गए। (इतिहासकार G.N. Sharma इसे एक कायरता नहीं, बल्कि कूटनीति (Strategic Move) मानते हैं, ताकि मुगलों को पहाड़ियों में फंसाया जा सके)।
  • वीर सेनापति – जयमल और फत्ता (Jaimal & Fatta): चित्तौड़ की रक्षा की जिम्मेदारी मेड़ता के जयमल राठौड़ और फत्ता सिसोदिया के कंधों पर थी।
    • कल्लाजी राठौड़ (चार हाथों वाले देवता): युद्ध के दौरान जयमल के पैर में गोली लग गई। तब उन्होंने अपने भतीजे कल्लाजी के कंधों पर बैठकर युद्ध किया। मुगलों को लगा जैसे ‘चार हाथों वाला कोई देवता’ लड़ रहा है।
  • साका (1568):
    • केसरिया: जयमल और फत्ता वीरगति को प्राप्त हुए।
    • जौहर: फत्ता की पत्नी फूल कंवर (Phool Kanwar) के नेतृत्व में महिलाओं ने जौहर किया।

अकबर का कलंक (Massacre): जीतने के बाद अकबर ने चित्तौड़ की आम जनता (30,000 लोग) का कत्लेआम (Massacre) करवाया। यह अकबर के नाम पर एक कभी न मिटने वाला धब्बा है। हालांकि, जयमल और फत्ता की वीरता से अकबर इतना प्रभावित हुआ कि उसने आगरा के किले के बाहर उनकी गजारूढ़ (हाथी पर सवार) मूर्तियाँ लगवाईं।

Quick Recap Table

घटना (Event)वर्ष (Year)प्रमुख पात्र (Key Figures)परिणाम (Result)
चित्तौड़ का दूसरा साका1534-35रानी कर्मावती, बाघ सिंहबहादुर शाह की जीत, जौहर हुआ।
पन्ना धाय का बलिदान1536पन्ना धाय, चंदन, बनवीरउदय सिंह की जान बचाई।
मावली का युद्ध1540उदय सिंह vs बनवीरउदय सिंह की जीत।
उदयपुर की स्थापना1559महाराणा उदय सिंहनई राजधानी की शुरुआत।
चित्तौड़ का तीसरा साका1568जयमल, फत्ता, अकबरअकबर की जीत, चित्तौड़ का पतन।

5. निष्कर्ष

चित्तौड़ हाथ से निकल चुका था। महाराणा उदय सिंह ने गोगुन्दा को अपनी अस्थायी राजधानी बनाया।

  • मृत्यु: 28 फरवरी 1572 (होली के दिन) गोगुन्दा में उदय सिंह का देहांत हुआ।
  • समाधि: उनकी छतरी गोगुन्दा में बनी हुई है।

मरते समय उदय सिंह ने अपनी प्रिय रानी (भटियाणी रानी) के प्रभाव में आकर अपने छोटे बेटे जगमाल को राजा घोषित कर दिया, जो कि अयोग्य था। लेकिन मेवाड़ के सरदार और सामंत जानते थे कि इस संकट की घड़ी में मेवाड़ को जगमाल की नहीं, बल्कि प्रताप (Pratap) की ज़रूरत है।

“अगर आप राजस्थान का पूरा इतिहास पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी [Rajasthan History Guide] पढ़ें।”

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