"The majestic Vijay Stambh in Chittorgarh Fort, standing as a symbol of the glorious history of the Mewar dynasty."

मेवाड़ राजवंश का – इतिहास बप्पा रावल से कुंभा तक |History of the Mewar Dynasty

Introduction

राजस्थान का इतिहास (History of Rajasthan) मेवाड़ के ज़िक्र के बिना अधूरा है। मेवाड़ केवल एक रियासत नहीं, बल्कि स्वाभिमान (Self-respect) और शौर्य का दूसरा नाम है। दुनिया में कई राजवंश आए और गए, लेकिन मेवाड़ का ‘गुहिल वंश’ (Guhila Dynasty) दुनिया का सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला राजवंश (Longest Serving Dynasty) माना जाता है।

Table of Contents

1. गुहिल वंश की उत्पत्ति (Origin of Guhila Dynasty)

मेवाड़ के शासक खुद को ‘सूर्यवंशी’ (Solar Dynasty) मानते हैं और भगवान राम के पुत्र ‘कुश’ के वंशज बताते हैं। इतिहासकार इस पर अलग-अलग राय रखते हैं, लेकिन सबसे authentic मत यह है:

  • संस्थापक (Founder): गुहादित्य (Guhaditya)
  • स्थापना वर्ष: 566 ई. (लगभग)
  • क्षेत्र: इन्होंने आभनेरी (Abhaneri) और इडर (Idar) के पास अपना राज्य स्थापित किया।

The Story Behind the Name: कहा जाता है कि गुहादित्य का जन्म एक गुफा (Cave) में हुआ था, इसलिए इनका नाम ‘गुहिल’ पड़ा। इनके वंशज आगे चलकर गुहिल और फिर सिसोदिया कहलाए।

Note for Readers: गुहादित्य केवल ‘आदि पुरुष’ (Original Founder) थे, लेकिन मेवाड़ साम्राज्य की असली नींव बप्पा रावल ने रखी थी।


2. बप्पा रावल: मेवाड़ के वास्तविक संस्थापक (Bappa RawalThe Real Founder – 734 AD)

अगर गुहादित्य ने बीज बोया, तो बप्पा रावल ने उसे वटवृक्ष बनाया। इतिहासकार G.H. Ojha के अनुसार, बप्पा रावल कोई नाम नहीं बल्कि एक उपाधि (Title) थी (बप्पा = पिता समान/आदरणीय, रावल = राजा)। इनका असली नाम कालभोज (Kalbhoj) बताया जाता है।

Key Achievements of Bappa Rawal:

  • चित्तौड़ विजय (Conquest of Chittor): 734 ई. में बप्पा रावल ने ‘मान मोरी’ (Mori Dynasty) को हराकर चित्तौड़ पर कब्ज़ा किया। यह मेवाड़ इतिहास का एक Turning Point था।
  • राजधानी (Capital): इन्होंने नागदा (Nagda) को अपनी राजधानी बनाया। यहीं पर इनका देहांत हुआ, जहाँ आज भी ‘बप्पा रावल की छतरी’ बनी हुई है।
  • एकलिंगजी मंदिर: बप्पा रावल ने उदयपुर के पास कैलाशपुरी में एकलिंगजी (Eklingji) का मंदिर बनवाया।
    • Interesting Fact: मेवाड़ के राजा खुद को राजा नहीं, बल्कि एकलिंगजी का ‘दीवान’ (Prime Minister) मानकर शासन करते थे।
  • First Gold Coin: राजस्थान के इतिहास में सबसे पहले सोने के सिक्के (115 ग्रेन) चलाने का श्रेय बप्पा रावल को जाता है। यह उस समय की उनकी strong economy को दर्शाता है।
  • अरब आक्रमणकारियों को रोका: बप्पा रावल ने न केवल भारत की रक्षा की बल्कि अरब आक्रमणकारियों (Arab Invaders) को खदेड़ते हुए ईरान तक पीछा किया। पाकिस्तान के शहर ‘रावलपिंडी’ का नाम इन्हीं के नाम पर माना जाता है।

राजपूत इतिहास में चौहान वंश का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा है, जिसने उत्तर भारत की राजनीति को प्रभावित किया। इस विषय पर विस्तार से जानने के लिए चौहान वंश का इतिहास देखें।

3. महत्वपूर्ण प्रारंभिक शासक (Important Early Rulers)

बप्पा रावल के बाद कई राजा हुए, लेकिन कॉम्पिटिशन एग्जाम्स और इतिहास के नज़रिए से ये तीन शासक सबसे महत्वपूर्ण हैं:

A. अल्लट (Allat) – 10वीं सदी

अल्लट ने मेवाड़ को प्रशासनिक (Administrative) रूप से मज़बूत किया।

  • Bureaucracy: मेवाड़ में नौकरशाही (Bureaucracy) की शुरुआत करने का श्रेय अल्लट को जाता है।
  • International Marriage: इन्होंने हूण राजकुमारी ‘हरियादेवी’ से विवाह किया। यह राजस्थान का पहला ज्ञात अंतर्राष्ट्रीय विवाह माना जा सकता है।
  • इन्होंने आहड़ (Ahar) को अपनी दूसरी राजधानी बनाया और इसे एक बड़े व्यापारिक केंद्र (Trade Centre) के रूप में विकसित किया।

B. जैत्रसिंह (Jaitra Singh) – (1213-1253 AD)

इतिहासकार दशरथ शर्मा ने जैत्रसिंह के काल को ‘मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्ण काल’ (Golden Era of Medieval Mewar) कहा है।

  • भूताला का युद्ध (Battle of Bhutala – 1227 AD):जैत्रसिंह ने दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश (Iltutmish) को इस युद्ध में बुरी तरह हराया। हालांकि, भागती हुई सेना ने नागदा को तहस-नहस कर दिया था।
  • New Capital: नागदा के नष्ट होने के बाद, जैत्रसिंह ने चित्तौड़गढ़ को अपनी नई और स्थायी राजधानी बनाया।

4. रावल रतन सिंह और चित्तौड़ का पहला साका (1303 AD)

यह रावल शाखा (Rawal Branch) के अंतिम शासक थे। इनका शासनकाल छोटा था, लेकिन इतिहास में अमर हो गया।

  • आक्रमणकारी: अलाउद्दीन खिलजी (Alauddin Khilji)।
  • कारण: अलाउद्दीन की साम्राज्यवादी नीति (Imperialism) और चित्तौड़ का सामरिक महत्व (Strategic location for trade route to Gujarat/Malwa)। (पद्मिनी की सुंदरता का वर्णन मलिक मुहम्मद जायसी के ‘पद्मावत’ में मिलता है, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज इसे मुख्य कारण नहीं मानते)।

The First Jauhar & Saka (1303 AD):

26 अगस्त 1303 को चित्तौड़ का पतन हुआ।

  1. केसरिया (Kesariya): रावल रतन सिंह और उनके सेनापति गोरा और बादल (Gora & Badal) ने वीरता से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की।
  2. जौहर (Jauhar): रानी पद्मिनी (Padmini) ने 1600 महिलाओं के साथ अग्नि में कूदकर अपने सतीत्व की रक्षा की।

यह चित्तौड़ के इतिहास का पहला साका (First Saka) था। इसके बाद अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम बदलकर ‘खिज्राबाद’ रख दिया और अपने बेटे खिज्र खाँ को सौंप दिया।


Summary Table (Quick Recap)

शासक (Ruler)मुख्य उपलब्धि (Key Achievement)
गुहादित्यगुहिल वंश की स्थापना (566 ई.)
बप्पा रावलचित्तौड़ विजय (734 ई.), सोने के सिक्के, एकलिंगजी मंदिर
अल्लटनौकरशाही (Bureaucracy) की शुरुआत, आहड़ को राजधानी बनाया
जैत्रसिंहभूताला का युद्ध (इल्तुतमिश को हराया), चित्तौड़ को राजधानी बनाया
रतन सिंहचित्तौड़ का पहला साका (1303 ई.), रावल शाखा का अंत

मेवाड़ का पुनरुद्धार और कुंभा का स्वर्ण युग (Rana Hammir to Maharana Kumbha)

1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद चित्तौड़ पर मुगलों का अधिकार हो गया था और ‘रावल शाखा’ समाप्त हो गई थी। लेकिन, मेवाड़ की कहानी हार पर खत्म नहीं होती। सिसोदा गाँव के जागीरदार हम्मीर ने फिर से केसरिया बाना पहना और मेवाड़ को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराया। यहीं से मेवाड़ में ‘सिसोदिया वंश’ (Sisodia Dynasty) और ‘राणा’ (Rana) उपाधि की शुरुआत हुई।

आइये जानते हैं मेवाड़ के ‘उद्धारक’ हम्मीर से लेकर ‘कला और स्थापत्य के जनक’ महाराणा कुंभा तक का गौरवशाली इतिहास।

Read महाराणा सांगा, खानवा का युद्ध और उदय सिंह 

1. राणा हम्मीर (Rana Hammir): मेवाड़ का उद्धारक (1326-1364 ई.)

1303 के बाद चित्तौड़ कुछ समय तक मुगलों और फिर जालौर के सोनगरा चौहानों (बनवीर) के पास रहा। 1326 ई. में हम्मीर ने बनवीर को हराकर चित्तौड़ पर पुनः अधिकार किया।

  • प्रमुख उपाधियाँ (Titles):
    • मेवाड़ का उद्धारक (Savior of Mewar): क्योंकि इन्होंने खोए हुए साम्राज्य को वापस पाया।
    • विषम घाटी पंचानन (Visham Ghati Panchanan): इसका अर्थ है “विकट परिस्थितियों में शेर के समान”। यह उपाधि ‘कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति’ और ‘कुम्भलगढ़ प्रशस्ति’ में मिलती है।
  • सिंगोली का युद्ध (Battle of Singoli – 1336 ई.): राणा हम्मीर ने दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक (Muhammad bin Tughlaq) को सिंगोली (बांसवाड़ा के पास) के युद्ध में बुरी तरह हराया और उसे बंदी बना लिया। यह एक ऐतिहासिक जीत थी।
  • निर्माण: इन्होंने चित्तौड़ दुर्ग में अन्नपूर्णा माता (बरबड़ी माता) का मंदिर बनवाया, जो मेवाड़ वंश की इष्ट देवी हैं।

2. महाराणा लाखा (Lakha): किस्मत का धनी राजा (1382-1421 ई.)

राणा हम्मीर के बाद क्षेत्र सिंह और फिर महाराणा लाखा गद्दी पर बैठे। लाखा का काल आर्थिक (Economically) रूप से मेवाड़ के लिए ‘लकी’ साबित हुआ।

  • जावर की खान (Silver Mines): लाखा के समय उदयपुर के जावर (Zawar) में चाँदी और सीसे की बहुत बड़ी खान मिली। इससे मेवाड़ की अर्थव्यवस्था (Economy) बहुत मज़बूत हो गई।
  • पिछोला झील (Pichola Lake): इसी समय एक बंजारे (Chhitar Banjara) ने अपने बैल की याद में उदयपुर में पिछोला झील का निर्माण करवाया।
  • मेवाड़ का भीष्म पितामह (Bhishma of Mewar): लाखा के पुत्र कुंवर चूंडा (Kunwar Chunda) ने अपने पिता की शादी मारवाड़ की राजकुमारी हंसाबाई से करवाने के लिए भीषण प्रतिज्ञा ली कि वे आजीवन गद्दी पर नहीं बैठेंगे। इसलिए उन्हें ‘मेवाड़ का भीष्म’ कहा जाता है।

3. महाराणा मोकल (Mokal) – (1421-1433 ई.)

लाखा और हंसाबाई के पुत्र मोकल राजा बने।

  • स्थापत्य: इन्होंने चित्तौड़ के ‘समाधिश्वर मंदिर’ (जिसे परमार राजा भोज ने बनवाया था) का जीर्णोद्धार (Renovation) करवाया, जिसे आज ‘मोकल जी का मंदिर’ भी कहते हैं।
  • हत्या: 1433 ई. में जिलवाड़ा (राजसमंद) नामक स्थान पर चाचा और मेरा (क्षेत्र सिंह के दासी पुत्र) ने महपा पंवार के साथ मिलकर मोकल की हत्या कर दी।

4. महाराणा कुंभा (Maharana Kumbha): एक युगपुरूष (1433-1468 ई.)

महाराणा कुंभा का शासनकाल मेवाड़ के इतिहास का स्वर्ण युग (Golden Era) माना जाता है। वे न केवल एक महान योद्धा थे, बल्कि एक महान निर्माता, लेखक और संगीतज्ञ भी थे।

A. प्रमुख युद्ध और विजय (Major Battles And Conquests)

  1. सारंगपुर का युद्ध (Battle of Sarangpur – 1437 ई.)
    • किसके बीच: कुंभा vs महमूद खिलजी (मालवा का सुल्तान)।
    • कारण: महमूद खिलजी ने मोकल के हत्यारों (महपा पंवार) को शरण दी थी।
    • परिणाम: कुंभा ने मालवा की सेना को रौंद दिया और महमूद खिलजी को 6 महीने तक चित्तौड़ में बंदी बनाकर रखा।
    • यादगार: इसी जीत की खुशी में कुंभा ने चित्तौड़ में 9 मंज़िला ‘विजय स्तम्भ’ (Vijay Stambh) बनवाया।
  2. नागौर विजय: कुंभा ने नागौर के शासक शम्स खां को हराया।

B. प्रमुख संधियाँ (Important Treaties)

  1. आवल-बावल की संधि (Treaty of Aawal-Baawal – 1453 ई.)
    • किसके बीच: मेवाड़ (कुंभा) और मारवाड़ (राव जोधा)।
    • मध्यस्थता: हंसाबाई (कुंभा की दादी)।
    • निर्णय: मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा (Boundary) तय की गई। सोजत (पाली) को सीमा का केंद्र माना गया। साथ ही, जोधा ने अपनी बेटी ‘श्रृंगार देवी’ का विवाह कुंभा के बेटे ‘रायमल’ से किया।
  2. चम्पानेर की संधि (Treaty of Champaner – 1456 ई.)
    • किसके बीच: मालवा (महमूद खिलजी) और गुजरात (कुतुबुद्दीन ऐबक) के सुल्तानों के बीच।
    • उद्देश्य: दोनों ने मिलकर कसम खाई कि वे संयुक्त रूप से मेवाड़ पर हमला करेंगे और कुंभा को हराएंगे।
    • परिणाम (Battle of Badanore – 1457): जब यह संयुक्त सेना (Joint Army) मेवाड़ आई, तो बदनौर (भीलवाड़ा) के युद्ध में कुंभा ने दोनों को एक साथ बुरी तरह पराजित किया। (कुछ इतिहासकार इसे अनिर्णीत भी मानते हैं, लेकिन कुंभा का वर्चस्व बना रहा)।

C. सांस्कृतिक उपलब्धियाँ (Cultural Achievements)

  • स्थापत्य कला का जनक: वीर विनोद के लेखक श्यामलदास के अनुसार, मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 दुर्गों का निर्माण अकेले कुंभा ने करवाया।
    • प्रमुख दुर्ग: कुम्भलगढ़ (अपनी पत्नी कुंभलदेवी की याद में), अचलगढ़ (सिरोही), बसंती दुर्ग।
  • साहित्य: कुंभा एक विद्वान थे। उन्होंने ‘संगीत राज’, ‘संगीत मीमांसा’ और ‘सूड़ प्रबंध’ जैसे ग्रंथ लिखे। उन्होंने जयदेव की ‘गीत गोविंद’ पर ‘रसिक प्रिया’ टीका लिखी।

प्रमुख उपाधियाँ (Titles): कुंभा को कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में कई उपाधियाँ दी गई हैं:

  • हाल गुरू: (पहाड़ी किलों का स्वामी)
  • छाप गुरू: (छापामार युद्ध में निपुण)
  • अभिनव भरताचार्य: (संगीत का ज्ञान होने के कारण)
  • हिन्दू सुल्तान: (हिन्दुओं का रक्षक)

अंत (Death of a Legend)

इतने महान शासक का अंत बहुत दुखद रहा। जीवन के अंतिम दिनों में कुंभा को ‘उन्माद’ (मानसिक रोग) हो गया था। 1468 ई. में कुम्भलगढ़ के मामदेव कुंड के पास उनके ही पुत्र उदा (Uda) ने उनकी हत्या कर दी। उदा को मेवाड़ का ‘पितृहंता’ (Patricide) कहा जाता है।

Quick Recap Table (Exam Oriented)

घटना/तथ्यविवरण (Details)
सिंगोली का युद्धराणा हम्मीर ने मुहम्मद बिन तुगलक को हराया।
जावर माइंसमहाराणा लाखा के समय मिली (चाँदी की खान)।
सारंगपुर युद्ध (1437)कुंभा ने मालवा को हराया – विजय स्तम्भ बनवाया।
आवल-बावल संधि (1453)मेवाड़-मारवाड़ सीमा निर्धारण (सोजत)।
चम्पानेर संधि (1456)मालवा और गुजरात का कुंभा के खिलाफ गठबंधन।
कुंभा की हत्या1468 ई. में उनके पुत्र उदा द्वारा।

Read महाराणा प्रताप और हल्दीघाटी का युद्ध

निष्कर्ष (Conclusion)

मेवाड़ का इतिहास केवल राजाओं की वंशावली नहीं, बल्कि स्वाभिमान और बलिदान की एक अमर गाथा है। बप्पा रावल ने जिस गुहिल वंश की नींव रखी थी, उसे राणा हम्मीर ने गिरने से बचाया और महाराणा कुंभा ने उसे बुलंदियों (Golden Era) तक पहुँचाया। इन शासकों ने साबित किया कि चाहे दुश्मन कितना भी बड़ा क्यों न हो, साहस और कूटनीति से उसे हराया जा सकता है।

लेकिन, मेवाड़ की असली परीक्षा अभी बाकी है। कुंभा के बाद अब बारी है उस योद्धा की, जिसके शरीर पर 80 घाव थे—महाराणा सांगा

अगले भाग में पढ़िए: कैसे महाराणा सांगा ने दिल्ली की सत्ता को हिलाया और बाबर के साथ हुए ऐतिहासिक खानवा के युद्ध की पूरी कहानी।

“अगर आप राजस्थान का पूरा इतिहास पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी [Rajasthan History Guide] पढ़ें।”

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