Illustration of Prithviraj Chauhan riding a royal elephant with soldiers and a large hill fort in the background.

चौहान वंश (Chauhan Dynasty) – उत्पत्ति, शासक और महत्वपूर्ण प्रश्न (MCQs)

राजस्थान के इतिहास के पन्नों में यदि शौर्य की स्याही सबसे ज्यादा गहरी कहीं है, तो वह चौहान वंश के अध्याय में है। अक्सर हम चौहानों का नाम लेते ही सीधे पृथ्वीराज चौहान पर पहुँच जाते हैं, लेकिन सांभर की नमक वाली झील से निकलकर दिल्ली के सिंहासन तक पहुँचने का यह सफर कई पीढ़ियों के संघर्ष का परिणाम था।

Table of Contents

1. चौहानों की उत्पत्ति (Origin Theories)

सरकारी परीक्षाओं (RPSC/UPSC) में अक्सर उत्पत्ति को लेकर प्रश्न पूछे जाते हैं। यहाँ हम किवदंतियों और ऐतिहासिक तथ्यों को अलग-अलग समझेंगे।

A. अग्निकुंड सिद्धांत (Agnikund Theory) – एक कथा

यह मत ऐतिहासिक कम और साहित्यिक ज्यादा है।

  • स्रोत: महाकवि चंदबरदाई कृत ‘पृथ्वीराज रासो’
  • विवरण: आबू पर्वत पर ऋषि वशिष्ठ ने दैत्यों से रक्षा के लिए यज्ञ किया। उस अग्निकुंड से चार योद्धा निकले— प्रतिहार, परमार, चालुक्य (सोलंकी) और अंत में सबसे शक्तिशाली ‘चौहान’
  • समर्थन: मुहणोत नैणसी और सूर्यमल मिश्रण ने इसे माना है, लेकिन आधुनिक इतिहासकार इसे केवल राजपूतों के शुद्धिकरण की प्रक्रिया मानते हैं।

B. वत्स गोत्रीय ब्राह्मण (Brahman Origin) – ऐतिहासिक तथ्य

यह सबसे प्रमाणिक और ‘यूनिक’ मत है जिसे डॉ. दशरथ शर्मा जैसे इतिहासकार सही मानते हैं।

  • स्रोत: बिजोलिया शिलालेख (1170 ई.)
  • तथ्य: इस शिलालेख में चौहानों को ‘वत्स गोत्रीय ब्राह्मण’ (Vatsa Gotra Brahmin) बताया गया है। इसका अर्थ है कि वे मूल रूप से ब्राह्मण थे जो बाद में क्षत्रिय धर्म (युद्ध कर्म) में आ गए।

C. सूर्यवंशी मत (Suryavanshi Theory)

  • स्रोत: ‘पृथ्वीराज विजय’ (जयानक), ‘हम्मीर महाकाव्य’ और डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा (G.H. Ojha)। अधिकांश शिलालेख भी इन्हें सूर्यवंशी ही बताते हैं।

D. विदेशी मत (Foreign Origin)

  • कर्नल जेम्स टॉड और वी.ए. स्मिथ इन्हें विदेशी (शक-सीथियन) मानते हैं, जिसे भारतीय इतिहासकार स्वीकार नहीं करते।

Read मेवाड़ राजवंश का – इतिहास 

2. सांभर (सपादलक्ष) के चौहान शासक (Rulers of Sambhar)

चौहानों का मूल स्थान सांभर झील के आसपास का क्षेत्र था, जिसे प्राचीन काल में ‘सपादलक्ष’ (सवा लाख गांवों का समूह) कहा जाता था। इनकी प्रारंभिक राजधानी अहिच्छत्रपुर (वर्तमान नागौर) थी। अजमेर बसने से पहले सांभर में कई ऐसे राजा हुए जिन्होंने प्रतिहारों की गुलामी (सामंत प्रथा) छोड़ी और स्वतंत्र राज्य बनाया।

1. वासुदेव चौहान (Vasudev Chauhan) – संस्थापक (551 ई.)

  • समय: लगभग 551 ई.।
  • महत्व: इन्हें चौहानों का ‘आदि पुरुष’ या ‘मूल पुरुष’ कहा जाता है।
  • कार्य: बिजोलिया शिलालेख के अनुसार, सांभर झील का निर्माण वासुदेव ने ही करवाया था। इन्होंने अपनी कुलदेवी शाकम्भरी माता का मंदिर बनवाया, जिसके कारण ये ‘शाकम्भरी के चौहान’ कहलाए।

2. गुवक प्रथम (Guvaka I)

वासुदेव के बाद कई शासक हुए जो गुर्जर-प्रतिहारों के सामंत थे। लेकिन गुवक प्रथम पहला शासक था जिसने स्वतंत्र होने का प्रयास किया।

  • हर्षनाथ मंदिर: इन्होंने सीकर में रेवासा के पास हर्षनाथ मंदिर का निर्माण करवाया। हर्षनाथ चौहानों के ईष्टदेव (Family Deity) माने जाते हैं।

3. चंदनराज (Chandanraj)

इनका शासनकाल इनकी पत्नी के कारण इतिहास में प्रसिद्ध है।

  • रानी रुद्राणी (आत्मप्रभा): चंदनराज की रानी रुद्राणी यौगिक क्रियाओं (Yoga) में निपुण थी। वह प्रतिदिन पुष्कर झील के तट पर 1000 दीपक जलाकर भगवान शिव की आराधना करती थी। यह तथ्य अक्सर गहरे शोध वाली किताबों में मिलता है।

4. वाक्पतिराज प्रथम (Vakpatiraj I)

ये एक शक्तिशाली शासक थे। इन्होंने अपने जीवनकाल में 188 युद्ध लड़े।

  • इन्होंने ‘महाराज’ की उपाधि धारण की, जो इनके बढ़ते प्रभाव को दर्शाती है।

5. सिंहराज (Simharaj)

यह सांभर के इतिहास में एक महत्वपूर्ण नाम है।

  • पूर्ण स्वतंत्रता: सिंहराज ही वह पहले चौहान शासक थे जिन्होंने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की और प्रतिहारों की अधीनता पूरी तरह त्याग दी।

6. विग्रहराज द्वितीय (Vigraharaj II) – (956 ई. के आसपास)

सांभर के शुरुआती शासकों में ये सबसे प्रतापी थे।

  • गुजरात विजय: इन्होंने गुजरात के चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को हराया।
  • आशापुरा माता मंदिर: इस विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने गुजरात के भड़ौच (Bhroach) में अपनी कुलदेवी आशापुरा माता के मंदिर का निर्माण करवाया।

7. गोविंदराज तृतीय (Govindraj III)

पृथ्वीराज विजय ग्रंथ में इन्हें बहुत वीर बताया गया है।

  • उपाधि: इनकी उपाधि ‘वरिघट’ (Vari-Gharat) थी, जिसका अर्थ है- ‘शत्रुओं का संहार करने वाला’।

Read गुर्जर-प्रतिहार वंश का इतिहास

3. अजमेर के चौहानों का उदय (Rise of Ajmer Chauhans)

सांभर के बाद चौहानों की शक्ति का केंद्र अजमेर बना। यहाँ से चौहान साम्राज्य का वास्तविक स्वर्ण काल शुरू होता है।

1. अजयराज (Ajayraj) – (1113 ई. – 1133 ई.)

इन्हें चौहान साम्राज्य का ‘वास्तविक संस्थापक’ कहा जाता है क्योंकि इन्होंने राज्य को एक सुरक्षित राजधानी दी।

  • अजमेर की स्थापना (1113 ई.): इन्होंने ‘अजयमेरु’ (Ajmer) नगर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया।
  • गढ़ बीठली (तारागढ़): सुरक्षा की दृष्टि से इन्होंने ‘बीठली पहाड़ी’ पर एक विशाल दुर्ग बनवाया। बाद में मेवाड़ के कुंवर पृथ्वीराज (उड़ना राजकुमार) ने अपनी पत्नी ‘तारा’ के नाम पर इसका जीर्णोद्धार करवाया, तब से इसे ‘तारागढ़’ कहा जाने लगा। इसे ‘राजस्थान का जिब्राल्टर’ भी कहते हैं।
  • सिक्के: अजयराज ने ‘श्री अजयदेव’ नाम से चांदी और तांबे के सिक्के चलाए। कुछ सिक्कों पर उनकी रानी ‘सोमलवती’ का नाम भी मिलता है।

2. अर्णोराज (Arnoraj) / आनाजी – (1133 ई. – 1155 ई.)

अजयराज के पुत्र अर्णोराज एक महान निर्माता और योद्धा थे।

  • तुर्कों का दमन: इनके समय तुर्कों ने अजमेर पर आक्रमण किया। अर्णोराज ने उन्हें बुरी तरह हराया। खून से सनी धरती को धोने के लिए उन्होंने चंद्रा नदी को रोककर ‘आनासागर झील’ (1137 ई.) का निर्माण करवाया।
  • वराह मंदिर: इन्होंने पुष्कर में वराह मंदिर बनवाया (जिसे बाद में जहाँगीर ने पानी में फिकवा दिया था)।
  • दरबारी विद्वान: देवबोध और धर्मघोष।
  • अंत: इनके पुत्र जगदेव ने ही इनकी हत्या कर दी, इसलिए जगदेव को ‘चौहानों का पितृहन्ता’ कहा जाता है।

3. विग्रहराज चतुर्थ (Vigraharaj IV) / बीसलदेव – (1153 ई. – 1163 ई.)

इनका काल चौहानों का ‘स्वर्ण युग’ (Golden Era) कहलाता है।

  • कवि बांधव: साहित्य प्रेम के कारण इन्हें यह उपाधि मिली। इन्होंने संस्कृत में ‘हरकेलि’ नाटक लिखा। (इस नाटक की पंक्तियाँ आज भी राजा राममोहन राय के स्मारक, इंग्लैंड और अढाई दिन के झोपड़े पर मिलती हैं)।
  • दिल्ली विजय: शिवालिक स्तम्भ लेख के अनुसार, विग्रहराज चतुर्थ ने तोमरों को हराकर दिल्ली (ढिल्लिका) पर अधिकार किया। दिल्ली जीतने वाले वे पहले चौहान शासक थे।
  • निर्माण:
    • अजमेर में एक संस्कृत पाठशाला बनवाई (जिसे बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक ने तोड़कर ‘अढाई दिन का झोपड़ा’ मस्जिद बना दिया)।
    • टोंक में बीसलपुर कस्बा और बीसलपुर बांध बनवाया।

4. पृथ्वीराज चौहान तृतीय (Prithviraj Chauhan III) – (1177 ई. – 1192 ई.)

इन्हें ‘राय पिथौरा’ और अंतिम हिंदू सम्राट कहा जाता है।

  • जन्म: 1166 ई. (अन्हिलपाटन, गुजरात)।
  • माता-पिता: सोमेश्वर और कर्पूरी देवी। (पिता की मृत्यु के समय पृथ्वीराज मात्र 11 वर्ष के थे, अतः माता ने संरक्षिका के रूप में शासन संभाला)।

प्रारंभिक विजय (Digvijay Policy)

गद्दी पर बैठते ही पृथ्वीराज ने ‘दिग्विजय’ की नीति अपनाई:

  1. नागार्जुन का दमन (1178 ई.): अपने चचेरे भाई नागार्जुन के विद्रोह को कुचला।
  2. भंडानकों का दमन (1182 ई.): सतलज क्षेत्र से आई भंडानक जाति का अंत किया।
  3. महोबा का युद्ध (1182 ई.): चंदेल शासक परमर्दीदेव को हराया। इसी युद्ध में परमर्दीदेव के सेनापति आल्हा और ऊदल (Alha and Udal) लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

कन्नौज विवाद और संयोगिता

कन्नौज के शासक जयचंद गहड़वाल और पृथ्वीराज के बीच शत्रुता थी। इसका कारण दिल्ली पर अधिकार की महत्वाकांक्षा और जयचंद की पुत्री संयोगिता का स्वयंवर से पृथ्वीराज द्वारा अपहरण करना बताया जाता है। हालाँकि, इतिहासकार इसे लेकर एकमत नहीं हैं, लेकिन ‘पृथ्वीराज रासो’ में इसका विस्तृत वर्णन है।

5. तराइन के युद्ध (Battles of Tarain)

यह इतिहास का निर्णायक मोड़ था।

तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.)

  • स्थान: तराइन (करनाल, हरियाणा)।
  • मध्य: पृथ्वीराज चौहान Vs मोहम्मद गौरी।
  • परिणाम: गौरी की सेना भाग खड़ी हुई। पृथ्वीराज की विशाल जीत हुई। गौरी अधमरा होकर भागा।
  • भूल: पृथ्वीराज ने भागती हुई तुर्क सेना का पीछा नहीं किया, जो उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई।

तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.)

एक साल बाद गौरी पूरी तैयारी और धोखे की योजना के साथ लौटा।

  • धोखा: गौरी ने संधि का प्रस्ताव भेजा जिससे राजपूत सतर्क नहीं रहे। उसने सुबह की नमाज के समय अचानक सोती हुई सेना पर हमला बोल दिया।
  • परिणाम: पृथ्वीराज चौहान की हार हुई। उन्हें सिरसा (हरियाणा) के पास सरस्वती नदी के किनारे बंदी बना लिया गया।
  • अंत: पृथ्वीराज की मृत्यु को लेकर विवाद है। ‘पृथ्वीराज रासो’ के अनुसार उन्होंने गजनी में गौरी को ‘शब्दभेदी बाण’ से मारा। जबकि समकालीन मुस्लिम इतिहासकार हसन निजामी लिखते हैं कि पृथ्वीराज ने कुछ समय अजमेर में गौरी के अधीन शासन किया (प्रमाण: ‘श्री मोहम्मद साम’ लिखे सिक्के) और बाद में विद्रोह करने पर मारे गए।

पृथ्वीराज के दरबार के नवरत्न (विद्वान)

  1. चंदबरदाई (पृथ्वीराज रासो)
  2. जयानक (पृथ्वीराज विजय)
  3. विद्यापति गौड़
  4. वागीश्वर जनार्दन
  5. विश्वरूप

तराइन के दूसरे युद्ध ने भारत में मुस्लिम साम्राज्य का दरवाजा खोल दिया। इसके बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने अजमेर और दिल्ली की सत्ता संभाली।

पृथ्वीराज के पुत्र गोविंदराज को कुछ समय के लिए अजमेर की गद्दी (करद शासक के रूप में) मिली, लेकिन बाद में पृथ्वीराज के भाई हरिराज ने उन्हें हटा दिया। तब गोविंदराज ने रणथम्भौर जाकर चौहानों की नई शाखा स्थापित की।

पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद उनके पुत्र गोविंदराज ने तुर्कों की अधीनता स्वीकार कर ली थी, लेकिन स्वाभिमान के चलते उन्हें अजमेर छोड़ना पड़ा। उन्होंने रणथम्भौर के जंगलों में एक नई शुरुआत की।

Read राजपूतों की उत्पत्ति

6. रणथम्भौर के चौहान (The Chauhans of Ranthambore)

रणथम्भौर का किला अपनी अभेद्यता के लिए प्रसिद्ध था। अबुल फज़ल ने इस किले के लिए कहा था- “बाकी सब दुर्ग नंगे हैं, केवल यही एक दुर्ग बख्तरबंद है।”

संस्थापक: गोविंदराज (1194 ई.)

पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र गोविंदराज ने 1194 ई. में रणथम्भौर में चौहान वंश की स्थापना की। उनके बाद वल्हण, प्रहलादन और वीरनारायण जैसे शासक हुए, लेकिन इस वंश का सबसे प्रतापी राजा ‘हम्मीर देव’ था।

हम्मीर देव चौहान (Hammir Dev Chauhan) – (1282 ई. – 1301 ई.)

हम्मीर, जैत्रसिंह (Jaitrasingh) के पुत्र थे। उन्होंने अपने पिता के 32 वर्षों के शासन की याद में रणथम्भौर किले में ’32 खंभों की छतरी’ (न्याय की छतरी) बनवाई, जहाँ बैठकर वे न्याय किया करते थे।

हम्मीर की विशेषता: हम्मीर अपनी ‘हट’ (Stubbornness) और ‘शरणार्थी रक्षा’ के लिए इतिहास में अमर हैं। उनके बारे में एक दोहा बहुत प्रसिद्ध है:

“सिंह सवन, सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार। तिरिया तेल, हम्मीर हठ, चढ़ै न दूजी बार॥”

अलाउद्दीन खिलजी से संघर्ष (Conflict with Alauddin Khilji): हम्मीर देव ने अपने जीवन में 17 युद्ध लड़े जिनमें से 16 में विजयी रहे। 17वां और अंतिम युद्ध अलाउद्दीन खिलजी के खिलाफ था।

  1. जलालुद्दीन खिलजी का हमला (1290-92 ई.): अलाउद्दीन से पहले जलालुद्दीन खिलजी ने किले का घेरा डाला। जब वह जीत नहीं पाया, तो अपनी झेंप मिटाने के लिए यह कहकर लौट गया- “मैं ऐसे 10 किलों को मुसलमान के एक बाल के बराबर भी महत्व नहीं देता।”
  2. अलाउद्दीन का आक्रमण (1301 ई.):
    • कारण: हम्मीर ने मंगोल विद्रोही ‘मुहम्मद शाह’ और ‘केहब्रू’ को शरण दी थी। अलाउद्दीन ने उन्हें वापस माँगा, लेकिन हम्मीर ने “शरण में आए व्यक्ति को धोखा देना राजधर्म के खिलाफ है” कहकर मना कर दिया।
    • विश्वासघात: अलाउद्दीन ने छल का सहारा लिया। उसने हम्मीर के दो सेनापतियों रणमल और रतिपाल को दुर्ग का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। इन गद्दारों ने गुप्त रास्ते बता दिए और रसद सामग्री (अनाज) में हड्डियों का चूरा मिलवा दिया।

राजस्थान का प्रथम साका (First Saka of Rajasthan – 1301 ई.): जब रसद खत्म हो गई और हार निश्चित हो गई:

  • केसरिया: हम्मीर देव चौहान ने अपने साथियों के साथ केसरिया बाना पहनकर युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए।
  • जौहर: हम्मीर की रानी रंगा देवी (Ranga Devi) और पुत्री देवल दे (Deval De) ने ‘पदमला तालाब’ में कूदकर जल जौहर (Water Jauhar) किया।
  • यह राजस्थान के इतिहास का पहला प्रमाणित साका माना जाता है। (तारीख: 11 जुलाई 1301 ई.)।

विद्वान: हम्मीर के दरबार में ‘राघवदेव’ (गुरु) और ‘बीजादित्य’ (कवि) प्रमुख थे।

7. जालौर के चौहान (The Chauhans of Jalore – Sonagara)

जालौर का प्राचीन नाम ‘जाबालिपुर’ था। यहाँ का किला ‘सुवर्णगिरि’ पहाड़ी पर बना है, इसलिए यहाँ के चौहान ‘सोनगरा चौहान’ कहलाए।

संस्थापक: कीर्तिपाल चौहान (1181 ई.)

कीर्तिपाल, नाडोल शाखा के अलहण के पुत्र थे।

  • उन्होंने 1181 ई. में परमारों से जालौर छीनकर यहाँ चौहान वंश की नींव रखी।
  • इतिहासकार मुहणोत नैणसी ने उन्हें “कीतू एक महान राजपूत” कहा है।

कान्हड़देव चौहान (Kanhad Dev Chauhan) – (1305 ई. – 1311 ई.)

जालौर शाखा के सबसे शक्तिशाली शासक। इनके और अलाउद्दीन खिलजी के बीच संघर्ष के मुख्य कारण थे:

  1. गुजरात अभियान: 1298 ई. में खिलजी की सेना गुजरात सोमनाथ मंदिर को लूटने जा रही थी। कान्हड़देव ने उन्हें जालौर से रास्ता देने से मना कर दिया।
  2. वीरमदेव और फिरोजा की प्रेम कथा: लोककथाओं और नैणसी की ख्यात के अनुसार, अलाउद्दीन की बेटी फिरोजा, कान्हड़देव के पुत्र वीरमदेव से प्रेम करने लगी थी, लेकिन वीरमदेव ने शादी से मना कर दिया। इससे नाराज होकर अलाउद्दीन ने हमला किया।

संघर्ष के चरण:

  • शिवाणा का साका (1308 ई.):
    • जालौर जीतने से पहले ‘शिवाणा दुर्ग’ (बाड़मेर) को जीतना जरुरी था, जिसे ‘जालौर दुर्ग की कुंजी’ (Key to Jalore Fort) कहा जाता था।
    • वहाँ कान्हड़देव के भतीजे सातल देव और सोम ने वीरता से सामना किया।
    • यहाँ भी भावला नामक सैनिक ने विश्वासघात किया और पानी के कुंड (भांडेलाव तालाब) में गौ-रक्त मिलवा दिया।
    • सातल देव मारे गए और रानियों ने जौहर किया। अलाउद्दीन ने शिवाणा का नाम बदलकर ‘खैराबाद’ रख दिया।
  • जालौर का साका (1311 ई.):
    • शिवाणा के बाद तुर्कों ने जालौर को घेरा।
    • यहाँ दहिया राजपूत बीका ने गद्दारी की और किले का गुप्त रास्ता बता दिया। (बाद में बीका की पत्नी ने ही देशद्रोही पति को मार डाला था, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी)।
    • कान्हड़देव और वीरमदेव लड़ते हुए मारे गए। रानियों ने जौहर किया।
    • अलाउद्दीन ने जालौर का नाम बदलकर ‘जलालाबाद’ कर दिया और वहां एक ‘तोपखाना मस्जिद’ (जो पहले परमारों का संस्कृत विद्यालय था) बनवाई।
  • स्रोत: इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी पद्मनाभ द्वारा रचित ग्रंथ ‘कान्हड़दे प्रबंध’ और ‘वीरमदेव सोनगरा री बात’ से मिलती है।

8. हाड़ौती के चौहान (Hada Chauhans of Bundi & Kota)

कोटा, बूंदी और बारां का क्षेत्र ‘हाड़ौती’ कहलाता है। यहाँ चौहानों की ‘हाड़ा’ शाखा का शासन था।

बूंदी (Bundi State)

  • संस्थापक: देवा हाड़ा (Deva Hada) ने 1241 ई. में मीणा शासकों को हराकर बूंदी राज्य की स्थापना की।
  • तारागढ़ किला (बूंदी): बरसिंह हाड़ा ने एक पहाड़ी पर तारागढ़ किला बनवाया। यह किला अपने भित्ति चित्रों (Wall Paintings) के लिए विश्व प्रसिद्ध है। (याद रखें: राजस्थान में दो तारागढ़ हैं – एक अजमेर में और एक बूंदी में)।
  • सुर्जन हाड़ा: 1569 ई. में सुर्जन हाड़ा ने अकबर की अधीनता स्वीकार की और रणथम्भौर का किला मुगलों को सौंप दिया।

कोटा (Kota State)

  • कोटा पहले बूंदी रियासत का ही हिस्सा था।
  • स्वतंत्र राज्य: 1631 ई. में मुगल बादशाह शाहजहाँ ने बूंदी के शासक रतन सिंह के पुत्र माधोसिंह को कोटा का स्वतंत्र शासक घोषित किया।
  • इस प्रकार, कोटा एक स्वतंत्र रियासत बना। बाद में कोटा के झाला जालिम सिंह एक प्रसिद्ध कूटनीतिज्ञ प्रशासक हुए।

9. सिरोही के चौहान (Deora Chauhans of Sirohi)

सिरोही में चौहानों की ‘देवड़ा’ (Deora) शाखा का शासन था।

  • संस्थापक: लुम्बा (Lumba) ने 1311 ई. में परमारों को हराकर आबू और चंद्रावती पर अधिकार किया और देवड़ा शाखा की स्थापना की।
  • सिरोही की स्थापना: 1425 ई. में सहसमल (Sahasmal) ने ‘सिरोही’ नगर बसाया और इसे अपनी राजधानी बनाया।
  • तलवारें: सिरोही अपनी दोधारी तलवारों के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध था।
  • अंग्रेजों से संधि: यह एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है – सिरोही राजस्थान की अंतिम रियासत थी जिसने अंग्रेजों (East India Company) के साथ सहायक संधि (Subsidiary Alliance) पर हस्ताक्षर किए (1823 ई. में, शासक शिवसिंह के समय)।

“अगर आप राजस्थान का पूरा इतिहास पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी [Rajasthan History Guide] पढ़ें।”

10. निष्कर्ष (Conclusion)

चौहान वंश का इतिहास केवल युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, स्थापत्य कला और स्वाभिमान का एक दस्तावेज है।

  1. वीरता की मिसाल: पृथ्वीराज चौहान से लेकर हम्मीर देव और कान्हड़देव तक, चौहान शासकों ने हमेशा विदेशी आक्रमणकारियों के सामने ‘मातृभूमि रक्षा’ को प्राथमिकता दी। ‘हम्मीर हठ’ आज भी मुहावरा बना हुआ है।
  2. स्थापत्य कला: अजमेर का आनासागर, बीसलपुर बांध, रणथम्भौर के महल और बूंदी की चित्रशाला चौहानों की कला प्रेम के साक्षी हैं।
  3. साहित्य: ‘पृथ्वीराज रासो’, ‘कान्हड़दे प्रबंध’ और ‘विग्रहराज’ के नाटक यह बताते हैं कि वे न केवल तलवार के धनी थे, बल्कि कलम के भी पुजारी थे।

सरकारी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए, चौहान वंश राजस्थान इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण टॉपिक (High Yield Topic) है। उनकी उत्पत्ति से लेकर 1857 की क्रांति तक, चौहानों की विरासत राजस्थान की रगों में दौड़ती है।

Read महाराणा सांगा, खानवा का युद्ध और उदय सिंह 

FAQ

प्रश्न 1. किस शिलालेख में चौहानों को ‘वत्स गोत्रीय ब्राह्मण’ बताया गया है?

(A) बिजोलिया शिलालेख (B) चिरवा शिलालेख (C) श्रृंगी ऋषि का शिलालेख (D) अपराजित का शिलालेख उत्तर: (A) बिजोलिया शिलालेख

व्याख्या: 1170 ई. के बिजोलिया शिलालेख (भीलवाड़ा) के अनुसार चौहान मूल रूप से ब्राह्मण थे। डॉ. दशरथ शर्मा इसी मत का समर्थन करते हैं।

प्रश्न 2. चौहानों का मूल स्थान ‘सपादलक्ष’ की राजधानी कौन सी थी?

(A) अजमेर (B) अहिच्छत्रपुर (नागौर) (C) शाकम्भरी (D) रणथम्भौर उत्तर: (B) अहिच्छत्रपुर (नागौर)

व्याख्या: चौहानों की प्रारंभिक राजधानी अहिच्छत्रपुर थी, जिसे वर्तमान में नागौर कहा जाता है।

प्रश्न 3. “कवि बांधव” (कवियों का मित्र) की उपाधि किस चौहान शासक को प्राप्त थी?

(A) पृथ्वीराज चौहान III (B) अजयराज (C) अर्णोराज (D) विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) उत्तर: (D) विग्रहराज चतुर्थ

व्याख्या: विग्रहराज चतुर्थ स्वयं एक महान विद्वान थे (उन्होंने ‘हरकेलि’ नाटक लिखा) और विद्वानों का सम्मान करते थे, इसलिए उन्हें यह उपाधि मिली।

प्रश्न 4. राजस्थान का प्रथम ‘साका’ (Jauhar/Saka) कब और कहाँ हुआ?

(A) 1303 ई. (चित्तौड़गढ़) (B) 1301 ई. (रणथम्भौर) (C) 1311 ई. (जालौर) (D) 1567 ई. (चित्तौड़गढ़) उत्तर: (B) 1301 ई. (रणथम्भौर)

व्याख्या: अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय हम्मीर देव चौहान के नेतृत्व में केसरिया और रानी रंगा देवी के नेतृत्व में ‘जल जौहर’ हुआ था। यह राजस्थान का पहला प्रमाणित साका है।

प्रश्न 5. “हम्मीर हठ” किस शासक के लिए प्रसिद्ध है?

(A) हम्मीर देव सिसोदिया (B) हम्मीर देव चौहान (रणथम्भौर) (C) कान्हड़देव (D) राव मालदेव उत्तर: (B) हम्मीर देव चौहान (रणथम्भौर)

व्याख्या: शरणार्थियों (मुहम्मद शाह) की रक्षा के लिए अपनी जान देने और अपनी बात (वचन) से न पलटने के कारण उनकी हठ प्रसिद्ध है।

प्रश्न 6. जालौर के शासक कान्हड़देव और अलाउद्दीन खिलजी के मध्य संघर्ष की जानकारी किस ग्रंथ से मिलती है?

(A) पृथ्वीराज रासो (B) हम्मीर महाकाव्य (C) कान्हड़दे प्रबंध (D) पद्मावत उत्तर: (C) कान्हड़दे प्रबंध

व्याख्या: यह ग्रंथ ‘पद्मनाभ’ द्वारा लिखा गया है।

प्रश्न 7. अजमेर की ‘आनासागर झील’ का निर्माण किसने करवाया था?

(A) अजयराज (B) अर्णोराज (C) पृथ्वीराज III (D) विग्रहराज II उत्तर: (B) अर्णोराज (आनाजी)

व्याख्या: तुर्कों के खून से सनी धरती को धोने के लिए चंद्रा नदी के पानी को रोककर 1137 ई. के आसपास इसका निर्माण करवाया गया।

प्रश्न 8. अंग्रेजों के साथ सहायक संधि (Subsidiary Alliance) करने वाली राजस्थान की अंतिम रियासत कौन सी थी?

(A) कोटा (B) करौली (C) सिरोही (D) मारवाड़ उत्तर: (C) सिरोही

व्याख्या: सिरोही के चौहान (देवड़ा) शासक शिवसिंह ने 1823 ई. में सबसे अंत में अंग्रेजों से संधि की थी।

प्रश्न 9. तराइन का द्वितीय युद्ध किस वर्ष लड़ा गया?

(A) 1191 ई. (B) 1192 ई. (C) 1194 ई. (D) 1206 ई. उत्तर: (B) 1192 ई.

व्याख्या: इस युद्ध में मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान तृतीय को हराया था, जिससे भारत में तुर्की शासन की स्थापना हुई।

प्रश्न 10. किस चौहान शासक ने अजमेर में ‘संस्कृत कंठाभरण’ नामक पाठशाला बनवाई थी?

(A) अजयराज (B) पृथ्वीराज III (C) विग्रहराज चतुर्थ (D) वासुदेव उत्तर: (C) विग्रहराज चतुर्थ

व्याख्या: इसी संस्कृत पाठशाला को बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक ने तोड़कर ‘अढाई दिन का झोपड़ा’ (मस्जिद) में बदल दिया था।

4 thoughts on “चौहान वंश (Chauhan Dynasty) – उत्पत्ति, शासक और महत्वपूर्ण प्रश्न (MCQs)”

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