1. प्रस्तावना
भारतीय इतिहास के मध्यकाल, विशेषकर 7वीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी तक के कालखंड को ‘राजपूत काल’ के नाम से जाना जाता है। हर्षवर्द्धन की मृत्यु (647 ई.) के बाद उत्तर भारत में जो राजनीतिक शून्यता उत्पन्न हुई, उसे भरने का कार्य जिन राजवंशों ने किया, वे इतिहास में ‘राजपूत’ कहलाए। इन शासकों ने न केवल विदेशी आक्रमणों से भारत की रक्षा की, बल्कि कला, संस्कृति और साहित्य के संरक्षण में भी अद्वितीय योगदान दिया।
इतिहासकारों के बीच राजपूतों की उत्पत्ति का प्रश्न आज भी एक जटिल पहेली बना हुआ है। क्या वे प्राचीन वैदिक क्षत्रियों की संतान थे? या वे भारत में आए विदेशी आक्रमणकारी थे जो भारतीय समाज में घुल-मिल गए? इस ब्लॉग पोस्ट में हम इन सभी प्रश्नों का उत्तर प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर खोजेंगे।
2. ‘राजपूत’ शब्द का अर्थ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
‘राजपूत’ शब्द संस्कृत के ‘राजपुत्र’ का अपभ्रंश (corrupted form) है। वैदिक साहित्य और प्राचीन ग्रंथों में ‘राजपुत्र’ शब्द का प्रयोग राजा के पुत्र या क्षत्रिय वर्ग के लिए किया जाता था।
- महाभारत और रामायण: इन महाकाव्यों में ‘राजपुत्र’ शब्द का प्रयोग कुलीन क्षत्रिय योद्धाओं के लिए किया गया है।
- बाणभट्ट का हर्षचरित: 7वीं सदी में बाणभट्ट ने अपने ग्रंथ में सामंतों और सैनिकों के लिए ‘राजपुत्र’ शब्द का प्रयोग किया।
- चाचनामा: अरब आक्रमण के समय सिंध के इतिहास ग्रंथ ‘चाचनामा’ में भी दाहिर के सैनिकों के लिए यह शब्द प्रयुक्त हुआ है।
धीरे-धीरे, समय के साथ यह शब्द एक जाति विशेष का सूचक बन गया, जो युद्ध और शासन कार्य से जुड़े थे।
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3. उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत
इतिहासकारों ने राजपूतों की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए हम इन्हें 5 मुख्य भागों में विभाजित कर सकते हैं:
(A) अग्निकुल का सिद्धांत (Agnikunda Theory)
यह सिद्धांत सबसे प्रसिद्ध है, लेकिन इसे ऐतिहासिक से अधिक ‘साहित्यिक’ या ‘चारण भाटों की कल्पना’ माना जाता है।
- स्रोत: इस सिद्धांत का प्रथम उल्लेख चंदबरदाई द्वारा रचित महाकाव्य ‘पृथ्वीराज रासो’ में मिलता है। बाद में नैणसी और सूर्यमल्ल मिश्रण ने भी इसका समर्थन किया।
- कथा: इस सिद्धांत के अनुसार, जब पृथ्वी पर दैत्यों का आतंक बढ़ गया और धर्म का नाश होने लगा, तब महर्षि वशिष्ठ ने आबू पर्वत (माउंट आबू, राजस्थान) पर एक विशाल यज्ञ किया। इस यज्ञ की अग्नि (अग्निकुंड) से चार वीर पुरुषों की उत्पत्ति हुई:
- प्रतिहार (Pratihara)
- परमार (Paramara)
- चालुक्य/सोलंकी (Chalukya)
- चौहान (Chauhan)
- ऐतिहासिक विश्लेषण: आधुनिक इतिहासकार (जैसे डॉ. ईश्वरी प्रसाद) इसे केवल एक रूपक मानते हैं। उनका मानना है कि संभवतः विदेशी जातियों या स्थानीय जनजातियों को ‘अग्नि संस्कार’ द्वारा शुद्ध करके क्षत्रिय वर्ण में शामिल किया गया था, जिसे काव्यात्मक रूप में ‘अग्निकुल’ कहा गया।
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(B) विदेशी उत्पत्ति का सिद्धांत (Foreign Origin Theory)
कर्नल जेम्स टॉड जैसे ब्रिटिश इतिहासकारों और कुछ भारतीय विद्वानों ने राजपूतों को विदेशी जातियों (शक, हूण, कुषाण) की संतान बताया है।
1. कर्नल जेम्स टॉड का मत (शक-सीथियन वंशावली):
अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘Annals and Antiquities of Rajasthan’ में टॉड ने तर्क दिया कि राजपूत प्राचीन शक और सीथियन जातियों के वंशज हैं।
- तर्क: उन्होंने राजपूतों और शक/सीथियन जातियों के रीति-रिवाजों में समानता दिखाई, जैसे:
- सूर्य पूजा
- सती प्रथा
- अश्वमेध यज्ञ जैसा घोड़े का महत्व
- शस्त्र पूजा और मदिरा प्रेम।
- निष्कर्ष: टॉड के अनुसार, छठी शताब्दी में जो विदेशी जातियां भारत आईं, वे कालान्तर में यहाँ की संस्कृति में ढल गईं और शासक वर्ग होने के कारण ‘राजपूत’ कहलाने लगीं।
2. विन्सेंट स्मिथ और विलियम क्रुक का मत:
इन विद्वानों ने टॉड के मत का समर्थन करते हुए कहा कि गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद हूण और गुर्जर जैसी विदेशी जातियां भारत में बस गईं। उनका भारतीय समाज में विलय हुआ और उन्हें क्षत्रिय दर्जा दिया गया। स्मिथ ने विशेष रूप से प्रतिहारों को हूणों से संबंधित बताया।
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(C) प्राचीन क्षत्रियों से उत्पत्ति (Indigenous Origin – सूर्यवंशी और चंद्रवंशी)
इस मत के समर्थक वे भारतीय इतिहासकार हैं जो विदेशी उत्पत्ति के सिद्धांत का खंडन करते हैं। इनमें प्रमुख हैं डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा (G.H. Ojha) और सी.वी. वैद्य।
- डॉ. ओझा का तर्क: डॉ. ओझा का कहना है कि राजपूतों के शारीरिक गठन (लंबी नाक, लंबा कद) और रीति-रिवाज प्राचीन वैदिक आर्यों से मिलते हैं, न कि शकों या हूणों से।
- प्राचीन क्षत्रिय भी सूर्य और अग्नि की पूजा करते थे (वेदों में प्रमाण हैं), इसलिए केवल इस आधार पर उन्हें विदेशी कहना गलत है।
- सती प्रथा और शस्त्र पूजा महाभारत काल में भी प्रचलित थी।
- अभिलेखीय प्रमाण: राजपूत राजवंशों के शिलालेखों में उन्हें ‘सूर्यवंशी’ (राम के वंशज) और ‘चंद्रवंशी’ (कृष्ण के वंशज) बताया गया है।
- उदाहरण: प्रतिहारों ने स्वयं को लक्ष्मण का वंशज माना है।
- हम्मीर महाकाव्य में चौहानों को सूर्यवंशी बताया गया है।
निष्कर्ष: इस सिद्धांत के अनुसार, राजपूत विशुद्ध रूप से प्राचीन भारतीय क्षत्रियों की ही संतान हैं, जिन्होंने बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए थे, लेकिन विदेशी आक्रमणों के समय पुनः धर्म रक्षा हेतु शस्त्र उठाए।
(D) ब्राह्मणों से उत्पत्ति का सिद्धांत (Brahmin Origin Theory)
कुछ इतिहासकार पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर यह मानते हैं कि कुछ राजपूत राजवंशों की उत्पत्ति ब्राह्मणों से हुई है।
- डॉ. डी.आर. भंडारकर का मत: भंडारकर ने बिजोलिया शिलालेख (1170 ई.) का हवाला दिया, जिसमें वासुदेव चौहान के उत्तराधिकारी सामंत को ‘वत्स गोत्रीय ब्राह्मण’ कहा गया है।
- अन्य प्रमाण:
- मंडोर के प्रतिहारों को ब्राह्मण हरिश्चंद्र की संतान माना जाता है।
- गुहिल (मेवाड़) के शासकों को भी कई स्थानों पर ‘ब्रह्म-क्षत्रिय’ कहा गया है।
- व्याख्या: इसका अर्थ यह हो सकता है कि जब ब्राह्मणों ने वेदों को छोड़कर तलवार उठा ली और शासन करने लगे, तो वे कालान्तर में राजपूत कहलाए। इसे ‘ब्रह्म-क्षत्रिय’ परंपरा कहा जाता है।
(E) मिश्रित उत्पत्ति का सिद्धांत (Theory of Mixed Origin)
यह आधुनिक इतिहासकारों द्वारा स्वीकार किया जाने वाला सबसे संतुलित और तार्किक मत है। इसके प्रमुख समर्थक डॉ. देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय और आधुनिक समाजशास्त्री हैं।
- अवधारणा: यह सिद्धांत मानता है कि राजपूत कोई एक विशेष नस्ल नहीं थी, बल्कि यह एक सामाजिक-राजनीतिक वर्ग (Socio-political Class) था।
- विश्लेषण: 1. प्राचीन क्षत्रिय जातियां। 2. भारत में आईं विदेशी जातियां (शक, हूण, कुषाण) जो भारतीयकृत हो गईं। 3. कुछ स्थानीय जनजातियां (जैसे गोंड, भील) जो शासक बन गईं।
इन तीनों वर्गों का जब मिश्रण हुआ और उन्होंने ‘क्षत्रिय धर्म’ को अपना लिया, तो वे सामूहिक रूप से ‘राजपूत’ कहलाए। समाज ने अपनी सुरक्षा के लिए इन सभी लड़ाकू वर्गों को क्षत्रिय के रूप में मान्यता दे दी।
4. प्रमुख विद्वान और उनके मत (सारांश तालिका)
परीक्षा और त्वरित संदर्भ के लिए, नीचे दी गई तालिका में विद्वानों और उनके सिद्धांतों का सारांश दिया गया है:
| क्र. | सिद्धांत | समर्थक विद्वान | मुख्य तर्क |
| 1. | अग्निकुल सिद्धांत | चंदबरदाई, मुहणोत नैणसी, सूर्यमल्ल मिश्रण | वशिष्ठ के यज्ञ से 4 कुलों का उदय (चौहान, चालुक्य, परमार, प्रतिहार)। |
| 2. | विदेशी उत्पत्ति | कर्नल जेम्स टॉड, विन्सेंट स्मिथ, कनिंघम | शक, सीथियन और हूणों की संतान। रीति-रिवाजों में समानता। |
| 3. | वैदिक क्षत्रिय (सूर्य/चंद्रवंशी) | डॉ. जी.एच. ओझा, सी.वी. वैद्य | प्राचीन आर्यों की संतान, शारीरिक बनावट और परंपराओं के आधार पर। |
| 4. | ब्राह्मणों से उत्पत्ति | डॉ. डी.आर. भंडारकर, गोपीनाथ शर्मा | बिजोलिया शिलालेख और ‘ब्रह्म-क्षत्रिय’ परंपरा के आधार पर। |
| 5. | मिश्रित उत्पत्ति | डॉ. डी.पी. चट्टोपाध्याय | विदेशी और देशी जातियों का मिश्रण। |
“अगर आप राजस्थान का पूरा इतिहास पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी [Rajasthan History Guide] पढ़ें।”
5. निष्कर्ष (Conclusion)
राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में किसी एक मत को पूर्णतः सत्य मान लेना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। उपलब्ध साक्ष्यों का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि:
- राजपूतों का उदय एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम था।
- इसमें कोई संदेह नहीं कि अधिकांश राजपूत प्राचीन वैदिक क्षत्रियों के वंशज हैं (जैसा कि डॉ. ओझा मानते हैं)।
- परंतु, यह भी सत्य है कि छठी शताब्दी के बाद कई विदेशी जातियां (शक, हूण) भारतीय समाज में विलीन हुईं और शासक वर्ग में शामिल होकर राजपूत बन गईं।
- ‘अग्निकुल’ का सिद्धांत संभवतः इसी ‘शुद्धिकरण’ और समावेशी प्रक्रिया का एक पौराणिक आख्यान है।
अतः, हम कह सकते हैं कि “राजपूत प्राचीन क्षत्रियों, विदेशी आक्रांताओं और कुछ स्थानीय शासक वर्गों के सम्मिश्रण से उदित एक वीर जाति है,” जिसने भारतीय संस्कृति और धर्म की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी।




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