राजस्थान में मौर्य और बौद्ध संस्कृति का केंद्र
राजस्थान के इतिहास में बैराठ (प्राचीन नाम: विराटनगर) एक ऐसा अनूठा स्थल है जहाँ एक साथ तीन प्रमुख ऐतिहासिक कालखंडों—महाभारत काल, मौर्य काल और बौद्ध काल—के साक्ष्य मिलते हैं। यह सभ्यता हमें बताती है कि राजस्थान न केवल योद्धाओं की भूमि रही है, बल्कि यह शांति, धर्म और कला का भी एक बड़ा केंद्र था।
1. परिचय और भौगोलिक स्थिति (Introduction and Geographical Location)
- स्थिति (Location): बैराठ सभ्यता वर्तमान में राजस्थान के नवगठित कोटपूतली-बहरोड़ जिले (पूर्व में जयपुर जिले का भाग) में स्थित है।
- नदी (River): यह सभ्यता बाणगंगा (Banganga) नदी के किनारे विकसित हुई। मान्यता है कि इस नदी का उद्गम अर्जुन के तीर (बाण) से हुआ था, इसलिए इसे ‘अर्जुन की गंगा’ भी कहते हैं।
- प्राचीन नाम: इसका प्राचीन नाम ‘विराटनगर’ था। महाभारत काल में यह ‘मत्स्य महाजनपद’ की राजधानी हुआ करता था।
2. खोज और उत्खनन का इतिहास (History of Discovery and Excavation)
बैराठ का पुरातात्विक महत्व समझने के लिए यहाँ कई बार खुदाई की गई। यह खुदाई मुख्य रूप से यहाँ की तीन पहाड़ियों (डूंगरियों) पर केंद्रित रही: बीजक की पहाड़ी, भीम जी की डूंगरी और महादेव जी की डूंगरी।
पुनः उत्खनन (1962-63): बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के नीलरत्न बनर्जी (N.R. Banerjee) और कैलाश नाथ दीक्षित (K.N. Dikshit) ने यहाँ व्यापक स्तर पर कार्य किया।
प्रथम उत्खनन (1936-37): यहाँ पहली वैज्ञानिक खुदाई रायबहादुर दयाराम साहनी (Daya Ram Sahni) के नेतृत्व में की गई।
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3. प्रमुख पुरातात्विक साक्ष्य और विशेषताएं (Major Archaeological Evidence and Features)
बैराठ से प्राप्त अवशेषों को हम मुख्य रूप से तीन भागों में बाँट सकते हैं:
अ. मौर्यकालीन अवशेष: अशोक के शिलालेख (Mauryan Remains: Ashoka’s Inscriptions)
बैराठ, राजस्थान में मौर्य साम्राज्य का सबसे प्रबल प्रमाण है।
- भाब्रू शिलालेख (Bhabru Edict): 1837 में कैप्टन बर्ट (Captain Burt) ने ‘बीजक की पहाड़ी’ से सम्राट अशोक का एक शिलालेख खोजा था।
- महत्व: यह अशोक के बौद्ध होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। इसमें अशोक बुद्ध, धम्म और संघ (त्रिरत्न) में अपनी आस्था प्रकट करते हैं।
- वर्तमान स्थिति: सुरक्षा की दृष्टि से इस शिलालेख को काटकर कोलकाता संग्रहालय (एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल) में रख दिया गया है।
- यहाँ से अशोक कालीन चमकदार पॉलिश वाले पत्थर के टुकड़े भी मिले हैं, जो मौर्य कला की पहचान हैं।
ब. बौद्ध धर्म का केंद्र: गोल मंदिर (Center of Buddhism: The Round Temple)
- गोल बौद्ध मंदिर (Circular Buddhist Temple): बीजक की पहाड़ी पर एक गोलाकार ईंटों से बना मंदिर मिला है। यह भारत में मंदिर स्थापत्य कला (स्वतंत्र रूप से खड़े मंदिर) का सबसे प्राचीनतम उदाहरण माना जाता है।
- बौद्ध मठ (Monastery): मंदिर के पास ही बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए एक मठ (विहार) के अवशेष मिले हैं, जिसमें छोटे-छोटे कमरे बने हुए थे।
- नोट: इन बौद्ध अवशेषों के पास मुगल बादशाह अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के समय की एक ईदगाह और छतरी भी मिली है।
स. महाभारत कालीन संबंध (Mahabharata Connection)
- ऐसी मान्यता है कि पांडवों ने अपने वनवास का अंतिम वर्ष (अज्ञातवास) विराटनगर के राजा विराट के यहाँ भेष बदलकर बिताया था।
- भीमताल: ‘भीम जी की डूंगरी’ पर एक बड़ा गड्ढा है जिसे ‘भीमताल’ या ‘भीमलात’ कहते हैं। लोककथाओं के अनुसार, इसे भीम ने द्रौपदी की प्यास बुझाने के लिए लात मारकर बनाया था।
द. मुद्राएं और मृदभांड (Coins and Pottery)
- आहत मुद्राएं (Punch-marked Coins): यहाँ से चाँदी की 36 मुद्राएं मिली हैं, जो भारत की प्राचीनतम मुद्राएं हैं।
- यूनानी सिक्के: इन मुद्राओं में से 28 मुद्राएं ‘इंडो-ग्रीक’ (हिन्द-यवन) शासकों की हैं। इनमें से 16 सिक्के प्रसिद्ध यूनानी राजा मिनांडर (Menander) के हैं, जो बैराठ के यूनानी संपर्क की पुष्टि करते हैं।
- मृदभांड: यहाँ से प्राप्त मिट्टी के बर्तन ‘उतरी काले चमकीले मृदभांड’ (NBPW – Northern Black Polished Ware) संस्कृति के हैं, जो मौर्य काल की विशेषता है।
4. सभ्यता का पतन (Decline of the Civilization)
इतनी समृद्ध सभ्यता का अंत विदेशी आक्रमणों के कारण हुआ।
- हूण आक्रमण: छठी शताब्दी ईस्वी में श्वेत हूण शासक मिहिरकुल (Mihirakula) ने बैराठ पर आक्रमण किया। मिहिरकुल कट्टर शैव था और बौद्ध धर्म का विरोधी था, इसलिए उसने यहाँ के बौद्ध मठों और स्तूपों को नष्ट कर दिया।
- चीनी यात्री ह्वेनसांग: 7वीं शताब्दी में जब चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) भारत आया, तो उसने बैराठ (जिसे उसने ‘पो-लि-ये-तो’ कहा) का दौरा किया। उसने अपने विवरण में लिखा कि यह क्षेत्र कभी समृद्ध था, लेकिन हूणों के आक्रमण के बाद यहाँ के बौद्ध मठ उजड़ चुके थे।
राजस्थान की अन्य महत्वपूर्ण संक्षिप्त सभ्यताएं (Other Important Brief Civilizations of Rajasthan)
कालीबंगा, आहड़, गणेश्वर और बैराठ के अलावा, राजस्थान में कुछ अन्य पुरातात्विक स्थल भी हैं जो परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य संजोए हुए हैं:
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1. बागौर सभ्यता (Bagore Civilization) – भीलवाड़ा
यह राजस्थान ही नहीं, भारत के सबसे महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक स्थलों में से एक है।
- स्थिति: भीलवाड़ा जिले में कोठारी नदी के किनारे।
- काल: यह मुख्य रूप से मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age) का स्थल है।
- सबसे महत्वपूर्ण तथ्य: भारत में पशुपालन (Animal Husbandry) के प्राचीनतम साक्ष्य बागौर से ही प्राप्त हुए हैं। यहाँ के लोग शिकार के साथ-साथ पशुओं को पालना सीख गए थे।
- उत्खनन: इसका उत्खनन वी.एन. मिश्र (V.N. Misra) द्वारा किया गया। यहाँ से लघु पाषाण उपकरण (Microliths) भी बड़ी मात्रा में मिले हैं।
2. गिलूंड सभ्यता (Gilund Civilization) – राजसमंद
यह आहड़ सभ्यता (बनास संस्कृति) का ही एक विस्तार है।
- स्थिति: राजसमंद जिले में बनास नदी के किनारे।
- विशेषता: आहड़ में जहाँ कच्ची ईंटों का प्रयोग हुआ, वहीं गिलूंड में पकी हुई ईंटों (Burnt Bricks) का बड़े पैमाने पर प्रयोग देखने को मिलता है।
- साक्ष्य: यहाँ से एक विशाल भवन (संभवतः गोदाम) के अवशेष और पांच प्रकार के मिट्टी के बर्तन मिले हैं।
- उत्खनन: बी.बी. लाल और बाद में वी.एस. शिन्दे तथा ग्रेगरी पोसहल (पेन्सिल्वेनिया विश्वविद्यालय) ने यहाँ खुदाई की।
3. बालाथल सभ्यता (Balathal Civilization) – उदयपुर
यह भी ताम्रपाषाण युगीन आहड़ संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थल है।
- स्थिति: उदयपुर जिले की वल्लभनगर तहसील में।
- खोज: वी.एन. मिश्र के नेतृत्व में 1993 में खुदाई शुरू हुई।
- महत्वपूर्ण साक्ष्य:
- यहाँ से एक दुर्ग (Fortification) या किलेनुमा भवन के अवशेष मिले हैं।
- यहाँ 4000 साल पुराना एक मानव कंकाल मिला है, जिसे भारत में कुष्ठ रोग (Leprosy) का सबसे पुराना प्रमाण माना जाता है।
- यहाँ से बुने हुए सूती कपड़े के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं (बैराठ के बाद यह दूसरा स्थल है जहाँ से कपड़ा मिला है)।
निष्कर्ष (Conclusion)
बैराठ सभ्यता जहाँ हमें अशोक के धम्म और महाभारत के शौर्य की याद दिलाती है, वहीं बागौर, गिलूंड और बालाथल जैसी सभ्यताएं मानव विकास के क्रमिक चरणों—शिकार से पशुपालन और फिर ग्रामीण जीवन—को दर्शाती हैं। राजस्थान की धरती में दबे ये इतिहास के पन्ने प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत मूल्यवान हैं।




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