A composite image titled 'COINS AND INSCRIPTIONS OF RAJASTHAN' featuring four ancient, weathered Indian coins and two large stone tablets with carved script against a background montage of famous Rajput forts like Mehrangarh and Jaisalmer under a sunset sky.

राजस्थान के शिलालेख और सिक्के Coins and Inscriptions of Rajasthan

राजस्थान की धरती केवल अपनी सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि अपने उस गौरवशाली इतिहास के लिए जानी जाती है जो यहाँ के पहाड़ों, किलों और मंदिरों के पत्थरों पर आज भी जीवित है। इतिहास को जानने के लिए ‘शिलालेख’ (Inscriptions) सबसे सटीक प्रमाण माने जाते हैं।

इस ब्लॉग में हम राजस्थान के उन सभी प्रमुख शिलालेखों की यात्रा करेंगे, जो हमें मौर्य काल से लेकर रियासत काल तक की जानकारी देते हैं।

Table of Contents

1. राजस्थान के 5 सबसे महत्वपूर्ण शिलालेख (The Big Five)

जैसा कि हमने पहले चर्चा की थी, ये पांच शिलालेख राजस्थान के इतिहास की नींव हैं:

(i) भाब्रू का शिलालेख (Bhabru Inscription) – बैराठ, जयपुर

  • समय: तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व।
  • विशेषता: यह मौर्य सम्राट अशोक का है। इसकी खोज 1837 में कैप्टन बर्ट ने की थी। यह राजस्थान में मौर्य शासन और बुद्ध धर्म के प्रसार का सबसे बड़ा प्रमाण है। वर्तमान में यह कोलकाता के संग्रहालय में है।

(ii) घोसुण्डी शिलालेख (Ghosundi Inscription) – चित्तौड़गढ़

  • समय: द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व।
  • महत्व: यह राजस्थान का सबसे प्राचीन शिलालेख है जो ‘वैष्णव संप्रदाय’ (भागवत धर्म) के बारे में बताता है। इसकी भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है।

(iii) बिजोलिया शिलालेख (Bijolia Inscription) – भीलवाड़ा

  • समय: 1170 ईस्वी।
  • महत्व: यह चौहान वंश के इतिहास का खजाना है। इसी में चौहानों को ‘वत्स गोत्रीय ब्राह्मण’ कहा गया है। इसमें सांभर और अजमेर के चौहानों की वंशावली के साथ-साथ प्राचीन नगरों के नाम (जैसे विंध्यवल्ली – बिजोलिया) भी मिलते हैं।

(iv) राज प्रशस्ति (Raj Prashasti) – राजसमंद

  • समय: 1676 ईस्वी।
  • विश्व रिकॉर्ड: यह दुनिया का सबसे बड़ा शिलालेख है। राजसमंद झील के किनारे 25 काले पत्थरों पर खुदे इस लेख में मेवाड़ का पूरा इतिहास लिखा है। इसके रचयिता रणछोड़ भट्ट तैलंग थे।

(v) कुम्भलगढ़ शिलालेख (Kumbhalgarh Inscription) – राजसमंद

  • समय: 1460 ईस्वी।
  • विवरण: यह महाराणा कुम्भा के समय का है। इसमें मेवाड़ के शासकों की उपलब्धियों और उस समय की सामाजिक-धार्मिक स्थिति का वर्णन मिलता है। इसमें कुम्भा को ‘धर्म और पवित्रता का अवतार’ बताया गया है।

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2. राजस्थान के अन्य महत्वपूर्ण शिलालेख (The Extensive List)

अब बात करते हैं उन शिलालेखों की, जिनके बिना राजस्थान का इतिहास अधूरा है:

(vi) मानमोरी का शिलालेख (Maan Mori Inscription)

  • स्थान: चित्तौड़गढ़ के पास (मानसरोवर झील)।
  • समय: 713 ईस्वी।
  • रोचक तथ्य: कर्नल जेम्स टॉड (राजस्थान के इतिहास के जनक) इसे इंग्लैंड ले जा रहे थे, लेकिन जहाज असंतुलित होने के कारण उन्होंने इसे समुद्र में फेंक दिया था। इसमें चित्तौड़ के मौर्य राजा मान का उल्लेख था और ‘अमृत मंथन’ की कथा का भी वर्णन था।

(vii) सामोली शिलालेख (Samoli Inscription)

  • समय: 646 ईस्वी।
  • महत्व: यह मेवाड़ के गुहिल वंश के राजा ‘शिलादित्य’ के समय का है। यह राजस्थान में तांबा और जस्ता खनन (जावर माइंस) के प्राचीन इतिहास को प्रमाणित करता है।

(viii) कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति (Kirti Stambha Prashasti)

  • समय: 1460 ईस्वी।
  • रचयिता: अत्रि भट्ट और उनके पुत्र महेश भट्ट।
  • विशेषता: यह चित्तौड़गढ़ के विजय स्तंभ (कीर्ति स्तंभ) पर स्थित है। इसमें महाराणा कुम्भा की व्यक्तिगत खूबियों, उनके द्वारा लिखे गए ग्रंथों (जैसे संगीत राज) और उनकी जीती गई जंगों का शानदार वर्णन है।

(ix) रणकपुर प्रशस्ति (Ranakpur Prashasti)

  • समय: 1439 ईस्वी।
  • स्थान: पाली (रणकपुर जैन मंदिर)।
  • विशेषता: इसके सूत्रधार (वास्तुकार) ‘दीपा’ या ‘दीपाक’ थे। इसमें बप्पा रावल और कालभोज को अलग-अलग व्यक्ति बताया गया है (जो एक ऐतिहासिक बहस का विषय है)।

(x) घटियाला शिलालेख (Ghatiyala Inscription)

  • समय: 861 ईस्वी।
  • स्थान: जोधपुर।
  • वंश: प्रतिहार वंश।
  • विवरण: राजा कक्कु़क के समय के इस लेख में ‘मग’ जाति के ब्राह्मणों का उल्लेख है। यह प्रतिहार शासकों की राजनीतिक और सामाजिक जानकारी का मुख्य स्रोत है।

(xi) बसंतगढ़ शिलालेख (Basantgarh Inscription)

  • समय: 682 ईस्वी (विक्रम संवत)।
  • स्थान: सिरोही।
  • सबसे महत्वपूर्ण तथ्य: इस शिलालेख में पहली बार ‘राजस्थानियादित्य’ शब्द का प्रयोग मिलता है, जो राजस्थान नाम के प्राचीन उपयोग का संकेत देता है।

(xii) कणसवा (कणसुआ) का लेख

  • समय: 738 ईस्वी।
  • स्थान: कोटा।
  • महत्व: यह लेख अंतिम मौर्य राजा ‘धवल’ के बारे में जानकारी देता है। इससे पता चलता है कि 8वीं सदी तक राजस्थान के कुछ हिस्सों में मौर्यों का शासन था।

(xiii) हर्षनाथ की प्रशस्ति (Harshnath Inscription)

  • समय: 973 ईस्वी।
  • स्थान: सीकर।
  • विवरण: यह चौहान राजा विग्रहराज के समय की है। इसमें चौहानों के वंशक्रम और हर्षनाथ मंदिर के निर्माण की जानकारी मिलती है।

(xiv) अचलेश्वर शिलालेख

  • समय: 1285 ईस्वी।
  • स्थान: आबू (सिरोही)।
  • विशेषता: इसमें आबू के परमार शासकों और मेवाड़ के गुहिल शासकों की जानकारी मिलती है। इसमें यह भी बताया गया है कि राजपूतों की उत्पत्ति ऋषि वशिष्ठ के ‘अग्निकुंड’ से हुई थी।

(xv) बड़वा स्तंभ लेख (Badwa Pillar Inscriptions)

  • स्थान: बारां।
  • वंश: मौखरी वंश।
  • विवरण: यह तीसरी शताब्दी का है। इसमें ‘यज्ञ’ करने और ब्राह्मणों को दान देने की परंपरा का उल्लेख है।

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राजस्थान के प्रमुख सिक्के (Coins of Rajasthan)

सिक्कों के अध्ययन को ‘न्यूमिस्मैटिक्स’ (Numismatics) कहा जाता है। सिक्के हमें शासक के कालक्रम, आर्थिक स्थिति और साम्राज्य की सीमाओं की जानकारी देते हैं।

राजस्थान के प्राचीनतम सिक्के: ‘आहत’ मुद्राएं (Punch Marked Coins)

राजस्थान में सबसे पुराने सिक्के ‘आहत’ या ‘पंचमार्क’ सिक्के कहलाते हैं। ये चांदी या तांबे के होते थे और इन पर ठप्पा मारकर निशान बनाए जाते थे (जैसे मछली, पेड़, हाथी)।

  • प्रमुख केंद्र: रेड (टोंक), बैराठ (जयपुर), और नगरी (चित्तौड़गढ़)। टोंक के ‘रेड’ को तो ‘प्राचीन भारत का टाटानगर’ कहा जाता है क्योंकि यहाँ से सिक्कों का विशाल भंडार मिला है।

“राजस्थान के अन्य प्राचीन स्थलों और ऐतिहासिक स्रोतों की पूरी जानकारी के लिए हमारी [मुख्य गाइड: राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ] पढ़ें।”

रियासतकालीन प्रमुख सिक्के (Princely State Coins)

नीचे दी गई तालिका से आप राजस्थान की विभिन्न रियासतों में प्रचलित सिक्कों को आसानी से याद कर सकते हैं:

रियासतप्रमुख सिक्कों के नाम
मेवाड़ (उदयपुर)चांदी के सिक्के (द्रम्म, रूपक), ढींगला, गधिया, त्रिशूलिया, भिलाड़ी, चांदोड़ी।
मार्वड़ (जोधपुर)विजयशाही, भीमशाही, गधिया, लल्लूलिया।
जयपुर (आमेर)झाड़शाही (सबसे प्रसिद्ध), मोहम्मदशाही।
जैसलमेरअखैशाही, मोहम्मदशाही, डोडिया (तांबे का छोटा सिक्का)।
बीकानेरगजशाही।
बूंदीकटारशाही, चेहरेशाही, ग्यारहसना।
कोटागुमानशाही।
धौलपुरतमंचाशाही।
डूंगरपुरउदयशाही।
झालावाड़मदनशाही।

सिक्कों से जुड़ी रोचक बातें:

इंडो-ग्रीक सिक्के: बैराठ (जयपुर) से 28 इंडो-ग्रीक सिक्के मिले हैं, जिनमें से 16 सिक्के राजा मिनेंडर के थे।

झाड़शाही सिक्के: जयपुर रियासत के इन सिक्कों पर छह टहनियों वाले झाड़ (पेड़) का चिह्न होता था, इसलिए इन्हें झाड़शाही कहा गया।

चांदोड़ी सिक्के: ये मेवाड़ में प्रचलित थे, जिनका उपयोग अक्सर दान-पुण्य और वैवाहिक कार्यों में किया जाता था।

लल्लूलिया: यह सोजत (पाली) की टकसाल में बनने वाला मारवाड़ का सिक्का था।

शिलालेख और सिक्कों का ऐतिहासिक महत्व

1. वंशावली का निर्धारण

शिलालेखों के बिना हमें यह कभी पता नहीं चलता कि कौन सा राजा किसके बाद आया। उदाहरण के लिए, रणकपुर प्रशस्ति मेवाड़ के शासकों की सही वंशावली प्रदान करती है।

2. भौगोलिक सीमाओं का ज्ञान

जहाँ-जहाँ किसी राजा के सिक्के या शिलालेख मिलते हैं, वहां तक उस राजा का प्रभाव माना जाता है। चौहानों के शिलालेख दिल्ली तक मिले हैं, जो उनकी शक्ति का प्रमाण हैं।

3. सामाजिक और धार्मिक स्थिति

कणसवा (कोटा) के शिलालेख से पता चलता है कि राजस्थान में मौर्य वंश का अंतिम शासक ‘धवल’ था। वहीं, घटियाला शिलालेख (जोधपुर) प्रतिहार शासक कक्कु़क के समय की सामाजिक व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था पर प्रकाश डालता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

राजस्थान के शिलालेख और सिक्के केवल इतिहास के पन्ने नहीं हैं, बल्कि ये हमारे पूर्वजों के पराक्रम और वैभव की गवाही देते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से बिजोलिया शिलालेख, राज प्रशस्ति, झाड़शाही सिक्के और रेड (टोंक) के भंडार सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं।

लेखक की राय: इतिहास को रटें नहीं, उसे महसूस करें। जब आप अगली बार चित्तौड़गढ़ या कुम्भलगढ़ जाएं, तो उन पत्थरों पर लिखे इन अक्षरों को ध्यान से देखिएगा, वे आपसे बात करेंगे!

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